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Poetry

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May'22

ब्रेन-ड्रेन

आज सुबह से ही मधुवन में जाने कैसी हवा चली है। हर कनेर बीमार पड़ा है मुरझाई प्रत्येक कली है। …

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May'22

गुलाब से बातचीत

आज भोर के समय टहलते हुए अचानक पेरों तले दबे गुलाब की आह सुनी तो पँजा ऊँचा किये तनिक-सा मैं …

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May'22

ढूँठ

इरे-भरे वक्षों के वन में एक ढुँठ मुझसे यह बोला– भैया ! मैं भी हरा-भरा था मगर आँधियों से लड़ …

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May'22

बेसाखियाँ

दर्शक दीर्घा में बेठा हुआ मैं सामने देख रहा हूँ एक मैदान जिसमें कुछ इन्सान अलग-अलग ड्रैकों में दौड़ लगा …

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May'22

वे बिन वे लोग

कहाँ हैं वे दिन’ जब कोयलें गाती थीं भौरे झूमते थे । कहाँ हैं वे लोग जो सुबह से शाम …

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May'22

ओ मेरे सन

ओ मेरे बावले मन लोग जैसा कहते हैं बैसा ही बन । तू गाता है द्दं दुनिया खुशी की सगी …

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02

May'22

रेखा और बिन्दु

हम दोनों एक ही रेखा के दो अन्त बिन्दु जेसे एक दूसरे से दूर बहुत दूर हैँ किन्तु, दोनों के …

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May'22

सावनी हवाओं से

सावनी हवाओं से आँख हुई नम | जी हाँ ! यह जीवन भी जीते हैं हम ॥ पथरीली भूमि और …

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02

May'22

कहीं पर धूप

कहीं पर धूप, कहीं पर छाया, समझ गये सब तेरी माया, बादल, जादा नहीं चलेगा, यह दोरंगा खेल । घुप्प …

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May'22

सोकले टूटी पड़ी हैं

सोकले टूटी पड़ी हैं, द्वार जब सबको खुले हैं। लोग जाने क्यों मुझे बदनाम करने पर तुले हैं | बादलो! …

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