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सुख कैसे प्राप्त हो ? भाग – 1

सुख कैसे प्राप्त हो ? भाग – 1

क्षत्रिय शब्द का जो meaning होता था वो है “क्षत्रात त्रायते इति क्षत्रिय”, संस्कृत में जो उसका literal meaning है, क्षत्रिय शब्द का, यानी क्षत्र माने आक्रमण से, आपत्ति से जो रक्षा कर रहा है, वो क्षत्रिय है |  उसको शक्ति अपने पास इकट्ठी करनी चाहिए   | उसको राज्य को चलाने के लिए power इकट्ठी करनी चाहिए | Money की power भी इकट्ठी करनी चाहिए उसको | Physical power भी इकट्ठी करनी चाहिए उसको, हर तरह की power इकट्ठी करनी चाहिए उसको | वैश्य का काम था, बिज़नस करना | शूद्र का काम था कि तीनो वर्णों की सेवा करना | सेवा का मतलब ये नहीं था कि पैर दबाओ | सेवा का मतलब था कि उनके लिए जरूरत की चीजे सब बनाना, जैसे लोहार है, बढई है, चमार है | ये तीनो वर्णों के लिए जूते बनाना, टेबल, कुर्सी बनाना, खाट बनाना, लोहार का काम था लोहे की चीजें बनाना | ये सब शूद्र कहलाते थे | शूद्र का मतलब ये नहीं है, शूद्र कहते हैं तो लोगों के दिमाग में भंगी आ जाता है | ऐसा नहीं है | ये सभी शूद्र था और इन सबका काम था सेवा करना और इस तरह हरेक वर्ण के काम बंटे हुए थे | ये वो वर्ण व्यस्था थी जो वैदिक वर्ण व्यवस्था थी |

वैदिक काल के बाद में जब पुराण काल प्रारंभ हुआ, तब ये घपले शुरू हुए | एक दुसरे के काम में interfere करना और उसकी शुरुआत वसिष्ठ और विश्वामित्र से हुई | मैं कुछ कथाएं लगातार आपको सुनाऊंगा, फिर आप देखिये कैसे co-related हैं वो |

विश्वामित्र शिकार खेलने के लिए गया अपने सैनिकों के साथ जंगल में | उस समय के ethics के मुताबिक़ अगर कोई राजा शिकार खेलने जाता है और जहाँ शिकार खेलने गया है उसके पास में किसी ऋषि का आश्रम है तो उस area में शिकार करना prohibited था राजा के लिए | जब वो शिकार खेल रहा था तो उसके सिपाहियों ने बताया कि बगल में वसिष्ठ मुनि का आश्रम है, यहाँ शिकार करना प्रतिबंधित है | उन्होंने शिकार खेलने बंद कर दिया, विश्वामित्र ने | ये भी उस समय का नियम था कि यदि राजा को पता चल जाए कि यहाँ किसी ऋषि का आश्रम है और राजा वहां से गुजर रहा है तो राजा की duty थी कि आश्रम में जाये, रथ और घोड़े को छोड़ कर पैदल उतर कर जाए, ऋषि को प्रणाम करे और उसका हाल चाल ले और उस से पूछे कि कही किसी चीज की कोई कमी तो नहीं है और उस कमी को पूरा करे | ऋषि का कर्तव्य था कि वो जंगल में रहें | शहर और गाँव में जा कर न रहे और अगर राजा से भेंट होती है कभी, अगर वो कभी राज्य में जाए या कभी राजा कभी जंगल में मिलने आ जाए तो राजा के राज्य का कुशल क्षेम पूछे | उसकी प्रॉब्लम पूछे कि तुम्हें कोई प्रॉब्लम तो नहीं है और अगर वो प्रॉब्लम बताये तो उसकी प्रॉब्लम को solve करें क्योंकि उसका काम brain का है |

तो विश्वामित्र अपना रथ छोड़ कर के पैदल आश्रम में पहुंचे | उसने वसिष्ठ को प्रणाम किया, वसिष्ठ ने आशीर्वाद दिया, बैठे दोनों | बात चीत होती रही, जब शाम होने लगी तब विश्वामित्र ने कहा कि अब हम चलते हैं रात होने वाली है, हमारे साथ काफी लोग भी हैं, तो वसिष्ठ ने कहा कि आज रात को यहीं रुक जाओ | मैं ये कथा जैसी पुराणों में लिखी है, ठीक वैसी ही सुना रहा हूँ, तब आपको समझ में आएगा कि इसके पीछे message क्या है ? वसिष्ठ ने कहा, रात में यही रुक जाओ तो विश्वामित्र ने कहा कि हम लोग कहाँ यहाँ रात में रुक पायेंगे, हमारे साथ बहुत लोग हैं, उनकी व्यवस्था आप कहाँ कर पायेंगे | तब वसिष्ठ ने कहा कि नहि, सब व्यवस्था हो जायेगी, आप रुकिए | जब ज्यादा कहा वसिष्ठ ने, insist किया वसिष्ठ ने तो विश्वामित्र तैयार हो गए | अब विश्वामित्र ने देखा कि भोजन सबके लिए तैयार हो गया है और लगा दिया गया है और भोजन राजमहल में इतना बढ़िया नहीं बनता था, जितना बढ़िया वहां रखा गया सबके सामने खाने के लिए | विश्वामित्र बड़ा आश्चर्यचकित कि ये जंगल में रहने वाले तपस्वी, ब्राहमण जिन्हें इन सब चीजों से अलग रहना चाहिए, धन संपत्ति से, ठाठ बात से, खान पीन की ज्यादा बड़ी बड़ी आदतों से | वो सोचने लगा कि ये सब कहाँ से आया इसके पास | कोई बात नहीं | थोड़ी देर बाद में खाना वाना हो गया तो सोने की व्यवस्था होने लगी तो उसने देखा सोने की भी बड़ी अच्छी व्यवस्था की गयी | विश्वामित्र को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने वसिष्ठ से पूछा कि जब मैंने आपसे पुछा कि किसी चीज की जरूरत तो नहीं है तो आपने कहा कोई जरूरत नहीं है सब कुछ है हमारे पास  तो यहाँ तक तो ठीक है कि ब्राह्मणों को, ऋषियों को किसी चीज की जरूरत नहीं होती, क्योंकि वो indifferent होते हैं सब चीजों से | लेकिन मैं जो देख रहा हूँ, कि आपके पास जो व्यवस्था है वो तो राजाओं से भी ज्यादा अच्छी है | या कहाँ से आई आपके पास ?

तो वसिष्ठ ने बताया कि एक गाय है हमारे यहाँ, नंदिनी जिसका नाम है | ये नंदिनी गाय, कामधेनु गाय की लड़की थी जो समुन्द्र मंथन में से निकली थी और जिसको इंद्र ले गया था | यानी गायों की second generation थी, सबसे पहली गाय तो कामधेनु थी धरती पर और उसकी second generation थी | First generation, Sorry | तो उन्होंने कहा, ये नंदिनी गाय है, हमें किसी चीज की जरूरत पड़ती है तो इसको बता देते हैं, ये सब arrange कर देती है, इसी ने किया है ये सब | हमें अपने लिए जरूरत पड़ती नहीं है इन सब चीजो की | आप लोग आये हैं, महल में रहने वाले लोग हैं, यहाँ नहीं रह सकते थे ठीक से रात को, हमने उस से कहा और उसने ये सब व्यवस्था कर दी | विश्वामित्र सोचने लगा कि ये गाय तो राजाओं पर होनी चाहिए, क्योंकि संपत्ति पर अधिकार तो राजाओं का होता है | इनको संपत्ति की क्या जरूरत है |

अब देखिये कि ये एक इच्छा, undue इच्छा create हुई उसके अन्दर | उसके अन्दर ये भावना आई कि ब्राह्मण को इसकी क्या जरूरत है और मुझको ज्यादा जरूरत है | हमारे यहाँ ये ज्यादा काम आएगी, क्योंकि ब्राहमणों को तो इन चीजों की ज्यादा जरूरत पड़ती नहीं |

तो उसने गुरु वसिष्ठ से कहा, कि ऐसा करें ये गाय मुझे दे दें | वसिष्ठ ने कहा कि हम नहीं दे सकते क्योंकि ये हमारी नहीं है | किसी की हमारे यहाँ पर धरोहर है | धरोहर तो समझ रहे हैं न आप, कोई हमको अमानत दे गया है | उसने कहा किसकी अमानत है ये, उन्होंने कहा इंद्र की अमानत है ये, वो राजा इंद्रा जो देवताओं का राजा है | वो हमको दे गया है, इसलिए हम नहीं दे सकते इसको, हमारी चीज नहीं है  | विश्वामित्र ने कहा कोई बात नहीं है, हम ले जाते हैं इसको, आप हमें दे दीजिये और इंद्र से हम निबट लेंगे | वसिष्ठ ने कहा कि ठीक है हम जानते है तुम शक्तिशाली हो, तुम भी राजा हो, इंद्र भी राजा है, हो सकता है तुम उसको युद्ध में हरा दो, वो तुम्हारा कुछ न बिगाड़ पाए, लेकिन मैं अपने धर्म को नहीं छोड़ सकता | ये मेरी चीज नहीं है, मैं इसे नहीं दे सकता | जब इंद्र इसे वापिस ले जाए तब आप इंद्र से इसे छीन लेना | विश्वामित्र ने कहा, ठीक है अगर आप नहीं दे रहे हैं तो हम इसको छीन के ले जायेंगे, आप जाइये और कहिये इंद्र से |

वो राजा का जो अहंकार है वो उसके भीतर आया | ब्राहमण को अहंकारहीन होना चाहिए | जो ब्रहम को जानता है उसमें अहंकार नहीं होता | उसने कहा हम छीन के ले जायेंगे, वसिष्ठ ने कहा, ठीक है, ले जाओ, अगर ले जा सकते हो तो | जब उसने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि खोल लो इस गाय को | वो जब गाय खोलने लगे तो गाय ने वो सब मार दिए | अब विश्वामित्र सोचने लगा कि कैसे गाय को ले जा सकता हूँ | बहुत से सैनिक मार दिए उसने | वसिष्ठ ने फिर समझाया कि तुम इस गाय को नहीं ले जा पाओगे क्योंकि इस गाय की रक्षा ये खुद कर सकती है और हमारा धर्म इसकी रक्षा करेगा | आपमें इतनी शक्ति नहीं है कि आप हमारे धर्म का या इसकी शक्ति के ऊपर निकल जाएँ | विश्वामित्र लौट गया | फिर प्लान करके कुछ दिनों के बाद, अपनी पूरी सेना ले कर के उसने आश्रम के ऊपर आक्रमण किया | ये कहानी आपने सुनी होगी, ये सब | आक्रमण किया और बड़े अस्त्र शस्त्र चलाये बाहर से | आश्रम के वासी भी मरने लगे उसमें | लोगों ने वसिष्ठ को बताया जा कर के | वसिष्ठ को बड़ा क्रोध आया | क्रोध में शरीर से अंगारे निकलने लगे | ये  अतिश्योक्ति है क्योंकि वो पोएट्री में लिखे गए हैं इसलिए एक अतिश्योक्ति अलंकार होता है काव्य में तो बात बढ़ा चढ़ा कर कही गयी है कि अंगारे निकलने लगे | तो उनके शिष्यों ने वसिष्ठ से कहा कि आप इतना क्रोध कर रहे हैं आपकी तपस्या क्षीण हो जायेगी | तब वसिष्ठ शांत हुए और उन्होंने अपना ब्रह्म दण्ड, पुराने जो ऋषि होते थे उनके पास एक ब्रहम दण्ड होता था | पलाश का डंडा, पलाश यानि ढाक का होता है न पेड़, उसका डंडा, अपने पास रखते थे | तो वो डंडा ले जा कर के आश्रम के बीच में गाड़ दिया वसिष्ठ ने |

अब विश्वामित्र जितने अस्त्र शस्त्र चलाता था, वो उस डंडे से टकरा कर वहीँ गिर जाते थे, किसी को लगते नहीं थे | सारे अस्त्र शस्त्र ख़त्म हो गए विश्वामित्र के और विश्वामित्र कुछ नहीं कर सका | तब विश्वामित्र ने कहा –

धिक् बलम क्षत्रिय बलम, ब्रहम तेजो बलम बलम | एकेन ब्रह्म दंडेन सर्वस्त्राणि  हतानिनी |

उसने कहा – धिक् बलम क्षत्रिय बलम, क्षत्रिय की ताकत को धिक्कार है, ये ब्राहमण की शक्ति ही शक्ति है | यही सबसे बड़ी ताकत है | एकेन ब्रह्म दंडेन, इस जरा से ब्रह्म दण्ड ने, सर्वस्त्राणि  हतानिनी, मेरे जितने अस्त्र शस्त्र थे, सबको बेकार कर दिया | ये शक्ति बहुत बड़ी है और मन में सोचने लगा कि अब पहले मुझे ये शक्ति हासिल करनी है |

अब ब्राहमण की जो respect थी, वो ख़त्म | सोचियेगा, क्षत्रिय अपने ethics से बाहर जा रहा है | अतिक्रमण शुरू हुआ, ethics का | चला गया लौट कर फिर और उसने तप करना शुरू किया | क्योंकि उसने पता लगाया कि कैसे ब्राहमणों में ऐसी शक्ति आती है तो पता चला कि तप से आती है तो वो तप करने लगा | १०० साल का तप प्रारंभ किया कि १०० साल में तप पूरा होगा | जब ९९ साल हो गए तो इंद्र को चिंता हुई कि अगर इसका तप पूरा हो गया तो ये गाय को ले जाएगा | क्योंकि वो भी राजा था तो उसने ९९ साल पूरे होने पर उस तपस्या में विघ्न डाला और वो तपस्या नष्ट कर दी उसकी | विश्वामित्र को बड़ा दुःख लगा कि मैंने ये तपस्या भंग हो जाने दी | फिर उसने नए सिरे से तपस्या शुरू की, १०० साल की | ९९ साल पर फिर भंग हुई | फिर तीसरी बात तपस्या की | फिर ९९ साल पर इंद्र ने मेनका को भेजा और उस मेनका ने तपस्या भंग की | उस विश्वामित्र और मेनका से एक लड़की पैदा हुई थी, शकुंतला | नाम सुना होगा | वो भरत को ब्याही थी | तीसरी बार तपस्या भंग हुई |  फिर चौथी बार उसने की | चौथी बार में उसने अपनी तपस्या पूरी कर ली | तपस्या पूरी हुई, ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वो चरणों में लेट गया, विश्वामित्र | ब्रह्मा ने उसको उठाया, उठो राजर्षि, कह करे के | तो वो ब्रह्मा के ऊपर बिगड़ गया | बोला मैंने इतनी बड़ी तपस्या की | चार बार सौ सौ साल की तपस्या की और मैं अभी राजर्षि ही बना ? मैंने ब्रह्मर्षि बनने के लिए तपस्या की थी, इतनी बड़ी | ब्रहमा की तपस्या की थी, क्योंकि वो मुझे ब्रह्मर्षि बनाएगा | इसके लिए मैंने इतनी तपस्या की थी और तुमने मुझे राजर्षि ही कहा !

तब ब्रहमा ने कहा कि भाई, आज तुम्हारी तपस्या की शक्ति इतनी है कि मैं तुम्हारे आगे कुछ नहीं हूँ | तुम चाहो तो खुद क्रिएशन कर सकते हो दूसरा | मैं नहीं कर सकता | लेकिन ब्रह्मर्षि बनाने की जो power मेरे पास थी वो आज कल मेरे पास से suspend है | मेरे पास नहीं है | तो विश्वामित्र ने पुछा किसके पास है ? विश्वामित्र ने सोचा मन में कि जिसके पास होगी, अब उसकी तपस्या कर लूँगा और मांग लूँगा उस से | उसने बताया, कि ये शक्ति, ये power आज कल वसिष्ठ मुनि के पास है | (श्रोताओं के हंसने की आवाज )

अब विशवामित्र बड़ा परेशान, जिसको down करने के लिए वो ये शक्ति चाहता था अब वो ताकत देने की शक्ति भी उसी के पास है | वो चला आया और सोचा कि सारे झगडे की जड़ ये वसिष्ठ है, इसीको ख़त्म कर दूं | ह्त्या करने के लिए, छुरा ले कर के, रात में आश्रम पहुच गया |

अब ज़रा इस psychology को देखिये | मेरा जो टॉपिक आज का जो तय हुआ था, नरेश से. वो हुआ था कि हम सुख कैसे प्राप्त कर सकते हैं ? (वो करेंगे बाद में – एक श्रोता की आवाज), नहीं सब बातें चलेंगी, साथ में | इस कहानी में सब बातें एक साथ चलेंगी | psychology  देखिये |

पहले हमारे मन में ये पैदा होता है कि हमें इस चीज की जरूरत है, ये हमारे लिए होनी चाहिए, दुसरे के लिये नहीं | फिर हमारे मन में इच्छा होती है उसे पाने की | अभी हम ethics नहीं छोड़ रहे हैं, मांग रहे हैं, दुसरे ने जब मांगने पर नहीं दी, अपनी मजबूरी जताई, अब छीनेंगे, जब छीन भी नहीं सके, तब उस से ज्यादा शक्तिशाली बनना है | आप देखिये goal बदलता जा रहा है, विश्वामित्र का हर बार | पहले goal था गाय प्राप्त करना, अब goal हो गया वो शक्ति प्राप्त करना जिस से वो वसिष्ठ को हरा सके | अब शक्ति प्राप्त करने के लिए 400 साल साल तपस्या करने के बाद, जब वो नहीं मिली तब फिर goal बदल गया कि इस वसिष्ठ को ख़त्म करना है |

छुरा ले कर आश्रम में पहुच गया मारने के लिए | रात का समय था, झाडी में छिपा हुआ था, मौके के इन्तजार में | वसिष्ठ अपनी कुटिया के बाहर, अपनी पत्नी के साथ, लोपामुद्रा उनकी पत्नी का नाम था, उनके साथ बैठे हुए थे |  पूर्णमासी थी, चाँदनी फैली हुई थी, लोपामुद्रा वसिष्ठ से कह रही थी, देखो ! ये चाँदनी कितनी धवल और स्वच्छ है, कितनी शीतल है और पूरे विश्व में फैली हुई है | तो वसिष्ठ ने कहा कि नहीं ! चांदनी पूरी पृथ्वी पर फैली हुई नहीं है | आधी पर है और आधी पर नहीं है, दूसरी साइड में नहीं है और  न ये चांदनी इतनी पवित्र और स्वच्छ है जितना कि विश्वामित्र की तपस्या का यश, वो पूरी धरती पर फैला हुआ है, चाँदनी पूरी धरती पर फैली हुई नहीं है | विश्वामित्र के हाथ से छुरा गिर गया | सोचने लगा कि मैं जिसको मारने आया हूँ, उसके मेरे बारे में इस प्रकार के विचार हैं | जा के वसिष्ठ के पैरों में गिर गया और वसिष्ठ ने उसे कहा – उठो ब्रह्मर्षि ! और वो ब्रह्मर्षि हो गया, अब ऋषियों में गिना जाता है विश्वामित्र |

वर्ण परिवर्तित होते थे | ऐसा नहीं है कि ब्राह्मण के घर में पैदा हुआ है तो ब्राह्मण ही रहेगा या क्षत्रिय के घर में पैदा हुआ है तो क्षत्रिय ही रहेगा | ऐसा कुछ नहीं था हमारे यहाँ | मनुस्मृति में लिखा भी है –

जन्मात जायते शूद्र, संस्कारत द्विज उच्चयते |

जन्म से तो सब शूद्र पैदा होते हैं, संस्कार के बाद वो ब्राहमण, क्षत्रिय या वैश्य बनते हैं | द्विज माने केवल ब्राहमण नहीं है, ये ध्यान रखना | द्विज का मतलब है जिसका दो बार जन्म हुआ हो | एक बार माँ के पेट से जन्म होता है और फिर संस्कार होने पर दूसरा जन्म होता है | वो कहते हैं – संस्कारत द्विज उच्चयते, संस्कार से द्विज पैदा होता है | ब्राहमण को संस्कार डाले जाते थे, पढने के, सब चीजों को छोड़ने के, त्याग के, अपरिग्रह के, ये संस्कार डाले जाते थे | क्षत्रियों को संस्कार डाले जाते थे, बल बढाने के, शक्ति बढाने के, लोगों की रक्षा करने के, ये संस्कार डाले जाते थे | लेकिन वर्ण का अतिक्रमण हो सकता था और हुआ | ये हुआ कब, ब्राहमण बना कब वो ? ये तब हुआ जब उसने वो अहंकार छोड़ दिया | उस वसिष्ठ के चरणों में गिर गया, जिसे मारने के लिए गया था | जिसको down करना चाहता था, अहंकार बिलकुल ख़त्म हो गया | घमंड बिलकुल ख़त्म हो गया, अभिमान कुछ नहीं रहा उसका | उसको वो पदवी मिल गयी, यानी ब्राहमण बन सकता था यदि व्यक्ति ब्राहमण जैसे कर्म करे तो | लेकिन समाज में तो नियम थे हमारे वेदों के, उनका उल्लंघन प्रारंभ हुआ यहाँ से |

आगे चल कर आपने एक कथा और सुनी होगी, परशुराम की | ब्राहमण थे और वो धनुष बाण हाथ में लेकर, धनुष हाथ में लेकर क्शत्रिओन को मारते थे | ये भी अतिक्रमण था अपने धर्म का | जैसे विश्वामित्र का धर्म नहीं था, जो विश्वामित्र ने किया, वैसे ही परशुराम का धर्म नहीं था जो परशुराम ने किया | ये ब्राहमण और क्षत्रियों के बीच power की लड़ाई शुरू हुई | समाज में जो respect ब्राहमण की थी, क्षत्रिय को उसके दुसरे नम्बर पर माना जाता था, क्षत्रियों को लगा कि हम पहले नम्बर पर हैं | ब्राहमणों का अतिक्रमण शुरू हुआ, जमदग्नि को जा कर के मार दिया उसने, सहस्त्रार्जुन ने | तब परशुराम ने हथियार उठाया और क्षत्रियों को मारने लगे | ये ब्राहमण और क्षत्रियों की लड़ाई थी |

बाद में जो दो religion हमारे यहाँ आये | जैन religion और बौद्ध religion. दोनों के संस्थापक क्षत्रिय थे | ध्यान रखिये इस बात  को | महावीर और गौतम बुद्ध | दोनों क्षत्रिय थे, ये इन्फ्लुएंस की लड़ाई थी | ये लड़ाई थी, समाज में power हासिल करने की लड़ाई | अपने को establish करने की लड़ाई, ये लड़ाई तब शुरू हुई | अब बढती जा रही है | इस लड़ाई को बढाने में, लोगो के interest हैं, जो powerful लोग हैं, पैसे में powerful हों, चाहे business में powerful हों, चाहे politics में powerful हों, चाहे religion के क्षेत्र में powerful हों | सबने इस लड़ाई को अपने अपने ढंग से use करने की कोशिश की |  सबने अपने को ऊपर लाने की कोशिश की | उस कोशिश में नए नए धर्म चलाये गए | हिन्दुस्तान, हिंदुस्तान तो नहीं कहूँगा मैं उसे, भारतवर्ष, जो एक सार्वभौम राष्ट्र था, टुकड़ों में बाटता चला गया | जिस देश की एक भाषा थी, संस्कृत, हर भाषा जो होती है किसी देश में तो उसकी बहुत सी dilect चलती हैं, बोलियाँ होती हैं, संस्कृत की भी बहुत सी बोलियाँ थी | जब बौद्ध religion स्टार्ट हुआ | अब देखिएगा, कैसे देश टूटता है, स्वार्थ में लोगों के | जब बौद्ध religion शुरू हुआ तो एक भी पुस्तक बौद्ध धर्म की संस्कृत में नहीं लिखी गयी | जो उस समय की standard language पूरे भारत की | सारी पुस्तकें एक particular dialect में यानी पाली में लिखी गयीं और पाटलिपुत्र के राजाओं ने अपने को सम्राट declare किया, सार्वभौम राजा declare किया, दिल्ली के राजा को नहीं माना उन्होंने कहा हम सम्राट हैं और ताकत से सबको हराया और अपना effluence बनाने के लिए वो बौद्ध बने | बौद्ध बनने के बाद उन्होंने पंडितों को पैसा दे कर के, सम्मान दे कर के उन से कहा गया कि आप पाली का व्याकरण तैयार कीजिये | grammar तैयार किया गया, पाली एक भाषा हो गयी और संस्कृत गायब हो गयी पूरे देश में से | सारे बौद्ध religion की हर पुस्तक पाली में है | यही जैन religion के साथ हुआ | सारा जैन साहित्य जितना भी है, सारा अपभ्रंश भाषा में है | भारत की संस्कृत भाषा में नहीं है, हिंदी में भी नहीं है, हिंदी तो बहुत बाद की भाषा है | सारा साहित्य अपभ्रंश भाषा में लिखा गया (एक श्रोता – कौन सी भाषा में ? ) | अपभ्रंश | अपभ्रंश माने बिगड़ी हुई भाषा |

मैं एक बार lecture दे चूका हूँ, कैसे बिगड़ी हैं भाषा हमारे देश में | बड़े क्रमबद्ध तरीके से बिगड़ी हैं भाषा | अपभ्रंश का हेमचंद सूरी या सिद्धेन चन्द्र के नाम से बड़े भारी विद्वान् हुए जैनों में | उन्होंने व्याकरण तैयार करके उसको भी language बना दिया जबकि वो डायलेक्ट थी | उसके बाद देश टुकड़ों में बंट गया | छोटे छोटे राज्यों के राजाओं ने अपने को सम्राट घोषित कर दिया | एक सार्वभौम सम्राट नहीं रहा, पूरे देश का | छोटे छोटे टुकड़ों में देश बंटा | अब नए नए religion स्टार्ट किये सबने | सबने अपनी अपनी डायलेक्ट को language बनाया | ढेरों language तैयार होने लगीं | सबने अपने अपने यहाँ business को बढाया | नए नए religion चलाये, नए नए भगवान् बनते चले गये | नतीजा क्या हुआ ? लोगों की आस्थाएं, टुकड़ों में, खानों में बाँट दी | एक country को टुकड़ों में बांटा गया और बांटने की हद यहाँ तक हुई कि अंग्रेजों के जाने के बाद फिर भारत को बांटा गया, पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में |

ये religious लड़ाई नहीं थी, ये political बंटवारा था | ये religious बंटवारा नहीं था, ये political बंटवारा था |  अगर religious बंटवारा होता तो जिस तरह पाकिस्तान से सारे हिन्दू भारत में आये, भारत से भी सारे मुसलमान पाकिस्तान चले जाने चाहिए थे | उनको रोका गया, वोट बैंक बनाने के लिए | एक भी लड़ाई रिलीजियस नहीं थी और ये आज तक चल रहा है, कोई नई चीज नहीं है | सबके पीछे कुछ शातिर लोग हैं | शातिर कह सकते हैं आप उनको, इसलिए क्योंकि आप कुछ कर नहीं पा रहे हैं | इसलिए उन्हें शातिर कह सकते हैं, मैं उन्हें शातिर नहीं मानता | मैं मानता हूँ, कि वो समझदार लोग हैं और मूर्ख लोगों की गिनती ज्यादा है, समझदार बहुत थोड़े हैं | कुछ समझदार रूल कर रहे हैं, लोगों को | ये हमेशा से होता आया है | एक law है, survival of the fittest ! वो survive कर रहे हैं | नीचे के लोग मर रहे हैं | कोई धर्म के लिए मरा जा रहा है, कोई भाषा के लिए मरा जा रहा है, कोई जमीन के टुकड़े के लिए मरा जा रहा है, कोई राष्ट्र के लिए मरा जा रहा है, कोई किसी चीज के लिए मरा जा रहा है, कोई किसी चीज के लिए मारा जा रहा है, तरह तरह के अभिमान हमारे अन्दर भर दिए गए हैं | जो religious व्यक्ति, जो धार्मिक संत, जो धर्मध्वज जिसको हम कहते हैं, रिलीजियस लीडर | वो हमको आकर समझा रहा है, अभिमान को छोड़ दो और वही आ कर हमें समझा रहा है, अपने हिन्दू होने पर गर्व करो !!!

क्या meaning है ? हरेक हमको समझा रहा है, अभिमान करो, अपने राष्ट्र पर अभिमान करो, अपनी भाषा पर अभिमान करो, अपने धर्म पर अभिमान करो !!! हर चीज पर अभिमान करते चले जाओ | अगर कोई अपनी संपत्ति पर अभिमान कर रहा है तो क्या बुरा कर रहा है ? अगर कोई अपने घर पर अभिमान कर रहा है तो क्या बुरा कर रहा है ? कोई अपने लड़कों पर अभिमान कर रहा है तो क्या बुरा कर रहा है ? बात तो वही है !!! कहीं कोई फर्क नहीं है | हमको truth तक जाने नहीं दिया जाता |

मैं स्पष्ट शब्दों में कहना चाहता हूँ कि religion का ट्रांसलेशन धर्म नहीं है और धर्म माने religion नहीं है | ये wrong translation, ये भी politically motivated था |  एक ख़ास आदमी के द्वारा motivated थे ये ट्रांसलेशन, भारत में | जिसने धर्म का ट्रांसलेशन, religion किया |  धर्म का अगर सही ट्रांसलेशन अंग्रेजी में अगर कुछ हो सकता है तो that is properties. properties is धर्मं | religion is not धर्म | हिन्दू is not a religion. हिन्दू कर अर्थ है Indian. हिन्दुस्तान का रहने वाला | हिन्दू पर्सियन शब्द है और वहां इसका यही meaning है | आज भी हिन्दुस्तान के जो मुस्लिम है, वो जब मक्का और मदीना जाते हैं, हज करने जाते हैं तो दुबई के मुसलमान उनको हिंदी भाई कहते हैं | मुस्लिम भाई नहीं कहते क्योंकि वो हिन्दुस्तान के रहने वाले हैं | हिन्दू और हिंदी का meaning है हिन्दुस्तान का | Indian जिसको बोलते हैं | हिन्दू का literal meaning यही है, हिन्दू नाम का कोई religion नहीं है | किसी संस्कृत धर्म में, किसी  पुराण में, किसी शास्त्र में, किसी वेद में हिन्दू word नहीं मिलेगा आपको | क्योंकि Percian word है, हमारी भाषा का नहीं है ये word | लेकिन हम गुलामो ने मान लिया कि हम हिन्दू हैं और हमारे देश का नाम भारत है, वो गायब हो गया | हिन्दुस्तान हो गया, भारतीय गायब हो गये, हिन्दू हो गए हम, देश हिन्दुस्तान हो गया, भाषा हमारी हिंदी हो गयी |

तुलसीदास के समय तक जिसे आज हम हिंदी कहते हैं, इसका नाम हिंदी नहीं था | तुलसीदास से पहले, हिंदी शब्द था ही नहीं | language के लिए नहीं था | तुलसीदास जब लिखते हैं राम चरित मानस का सबसे पहला श्लोक, उसकी आखिरी लाइन में लिखते हैं |

भाषा निबंध मति मंजुल मातुनोचि

वो कह रहा है कि ये रघुनाथ गाथा, ये जो भगवान् राम की कथा है जो अभी तक संस्कृत में थी, मैं उसे भाषा यानि हिंदी में, उस समय इसे भाषा कहा जाता था, आज कल इसे हिंदी कहते हैं, मैं भाषा में लिख रहा हूँ | तुलसी के ही contemporary एक लेखक हुए, आचार्य केशव दास | तुलसी से पचास साथ साल पहले हुए हैं | उन्होंने लिखा

भाषा बोल न जानहि, जिनके कुल के दास,

भाषा कवि मति मंदभो तेह कुल केशव दास |

भाषा माने हिंदी, उस समय में इसको भाषा कहते थे, हिंदी नहीं कहते थे, हिंदी नाम नहीं था | भाषा बोल न जानही – जो भाषा बोलना नहीं जानते, जिनके कुल के दास – जिनके घर के नौकर भी हिंदी नहीं बोलते थे, संस्कृत बोलते थे, भाषा कवि मति मंद भो तेह कुल केशवदास – उस कुल में मैं केशवदास, मतिमंद – कमजोर बुद्धि वाला हिंदी का कवि पैदा हो गया |

भाषा माने हिंदी ही था | कबीर ने लिखा

संस्कृत है कूप जल, भाषा बहता नीर,

संस्कृत कुए का पानी है और भाषा यानि हिंदी बहता हुआ पानी है | हिंदी नाम नहीं था तब, ये हिंदी नाम तुलसीदास के बाद चला है | लेकिन हम मूर्खों ने मान लिया कि हमारी भाषा हिंदी है, हम मूर्खों ने मान लिया कि हमारे धर्म का नाम हिन्दू है, हम मूर्खों ने मान लिया कि हमारे देश का नाम हिन्दुस्तान है क्योंकि हम गुलाम थे, मालिक जो कह रहा है वही सही है |

फिर गोरे आ गए, उन्होंने कहा India, उन्होंने कहा हम Indian तो अब हम Indian हो गए, और हमारा देश India है | अपनी पहचान तो कही है ही नहीं | गुलामो ने मान लिया और उन्ही गुलामो के हाथ में शासन चला गया | सत्ता का transfer हुआ है, आजादी नहीं मिली हिन्दुस्तान को | माफ़ कीजियेगा, वो गुलाम मानसिकता आज भी वहां है | तो हिन्दू is not a religion, In hindu there are so many religion. Religion का meaning है, One Book, One God, One way of Worship. Religion का meaning है faith, एक आस्था, एक विश्वास | एक भगवान में हमारी आस्था हो, हम एक पुस्तक को मानते हों और एक हमारा way of worship हो | जैसे Cristian है, जैसे मुस्लिम है | हिन्दू is not a religion. हिन्दू में तो सैकड़ों, हजारो, लाखो भगवान् है | हजारों पुस्तकें हैं, एक दो पुस्तक नहीं है | हजारों पूजा पद्धतियाँ हैं, एक दो पूजा पद्धति नहीं है | शैव religion अलग था, जो केवल शिव को मानता था, उनकी अलग पुस्तक थी, शिव पुराण, उनके अलग शास्त्र थे, शैवागम कहलाते थे | उनकी अलग पूजा पद्धति थी | बौद्ध एक अलग religion बना, जैन एक अलग religion बना, शाक्त एक अलग religion बना, जो देवी को मानता था, दुर्गा को मानता था | उनकी अलग पुस्तक थी, देवी भागवत महापुराण, उनके आगम ग्रन्थ अलग थे, उनकी पूजा पद्धति अलग थी | वैष्णव religion चला तो उनके भगवान् अलग हैं, विष्णु हैं | उनके अलग ग्रन्थ हैं, विष्णु पुराण, भागवत पुराण | उनकी way of worship अलग है, शैवों वाली way of worship नहीं है | अब एक नया religion चल गया है, उनकी एक अलग पुस्तक है, अलग पूजा का तरीका है, अलग भगवान है | These are religions. Hindu is not a religion.

धर्म का जहाँ तक सवाल है, धर्म है properties. किसकी properties ? दुनिया में कोई भी वस्तु है, कोई भी पदार्थ है तो उसकी अपनी कुछ न कुछ प्रॉपर्टीज होती हैं | जैसे आग है, आग की प्रॉपर्टी है ताप | अगर ताप है तो आग है, आग है तो ताप है | आग होती तो ताप जरूर होगा, ताप होगा तो आग भी होगी | ये है धर्म | धर्म होगा तो धर्मी जरूर होगा, धर्मी मतलब उस धर्म को धारण करने वाला | धर्म का meaning है जो धारण किया जाता है, धर्मी का meaning ही जो धारण करता है | ‘धृ’ धातु से बनता है संस्कृत में ये धर्म शब्द और धर्मी शब्द | इसी ‘धृ’ धातु से धरती बनता है और इसी ‘धृ’ धातु से धैर्य बनता है | बहुत शब्द बनते हैं इस ‘धृ’ धातु से और ‘धृ’ धातु केवल एक ही अर्थ में आती है, धारण करने के लिए | ‘धृ धारणे’ धारण करने के लिए | तो जो चीज हमने by Birth धारण करते हैं, By Birth हम religion धारण नहीं करते | religion ले कर कोई पैदा नहीं होता | धर्म लेकर पैदा होता है |

अब प्रश्न है कि वो धर्म क्या है ? धर्म के लिए हमारे यहाँ कहा गया है

धर्मो रक्षति रक्षितः |

आप धर्म की रक्षा करेंगे, धर्म आपकी रक्षा करेगा | अगर आग की प्रॉपर्टी ताप ख़त्म हो जाए तो आग भी ख़त्म हो जायेगी तो आग को रखना है तो उसके धर्म को रखना पड़ेगा, ताप को और धर्म को रखना है तो आग को रखना पड़ेगा | Human Being की जो प्रॉपर्टीज हैं, वो धर्म हैं, वो यूनिवर्सल है | वो किसी अलग अलग conuntry का अलग अलग नहीं है, religion अलग अलग हो सकते हैं, धर्म अलग अलग नहीं हो सकता | धर्म तो पूरे विश्व में जो human being है, उसका का एक ही है, चाहे वो क्रिचियन हो, चाहे वो मुस्लिम हो, चाहे वो शैव हो, चाहे वो शाक्त हो, चाहे वो वैष्णव हो, चाहे वो सिख हो, चाहे जैन हो, चाहे बौद्ध हो, धर्मं सबका एक ही है, religion सबके अलग अलग हैं | वो धर्म हमारे ऋषियों ने बड़ी भरी तपस्या के बाद, तपस्या means बड़े भरी मंथन के बाद, जिसमें मेहनत होती है, थकान होती है, जिसमें तपता है आदमी भीतर से, शरीर को तपा के नहीं, उस तपस्या के बाद उसको निकला था इसलिए हम उसे सनातन धर्म भी कहते हैं |

सनातन, सन शब्द का जो literal meaning है वो है तपस्या, आतन माने निकला हुआ, लाया हुआ | तपस्या माने तप करके जो निकाल कर लाया गया है, that is सनातन | बहुत से लोग समझते हैं, सनातन माने old | ये meaning नहीं है, literal meaning आप भाषा में जाइए, सही सही आपको तब पता लगेगा | बड़ी तपस्या करके उन प्रॉपर्टीज को जो human being की हैं, उनको पहचान कर के अलग निकाला गया | उसको हम कहते हैं सनातन धर्म और वो यूनिवर्सल है | कोई इंसान ऐसा नहीं हो सकता जो उनसे बच जाए, हर इंसान में वो चीजें हैं, वो प्रॉपर्टीज सबमें होंगी, क्योंकि वो human being के अन्दर हैं | तो वो क्रिचियन में भी होंगी, वो कनाडा वाले में भी होंगी, वो अमेरिका वाले में भी होंगी, हिंदुस्तान वाले में भी होंगी, सबमें होंगी वो प्रॉपर्टीज सामान रूप से |

वो हमारे यहाँ मनुस्मृति में, जो हमारे यहाँ सबसे पुराना हिन्दुओं का शास्त्र है, मनुस्मुति, उसमें वो बताया गया है, दस चीजें बताई गयी हैं |

धृति क्षमा दमोस्तेयं, शौचं इन्द्रियनिग्रहः ।

धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो , दसकं धर्म लक्षणम ॥

ये दस चीजें बताई, ये धर्म के लक्षण है | सबसे पहली चीज है धृति, patience, धैर्य | हर इंसान में होता है ये, चाहे वो कनेडियन हो, चाहे वो अमेरिकन हो, चाहे वो indian हो, चाहे श्री लंका का हो, चाहे ऑस्ट्रेलियन हो, चाहे किसी भी country का हो और किसी भी religion को follow करता हो | ये प्रॉपर्टी हरेक के भीतर होती है, हमेशा होती है | जिस दिन धर्म नष्ट हो जाएगा, मनुष्य नष्ट हो जायेगा | Religion तो बनते बिगड़ते रहते हैं, religion के बनने बिगड़ने से मनुष्य पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला | लेकिन धर्म नष्ट हो गया जिस दिन, ये जो दस चीजें मैं गिना रहा हूँ, मनुष्य नष्ट हो जायेगा, यही धर्म है |

सबसे पहली चीज है patience. हाँ, अब वो नष्ट किया जा रहा है धीरे धीरे | patience लोगों का ख़त्म होने लगा है, लोगों में patience नहीं है | पहला है धृति, दूसरा है क्षमा | ये धृति ‘धृ’ धातु से बना है, हमारे यहाँ संस्कृत में एक क्वालिटी है, कुछ root words होते हैं, संस्कृत में पहले डिक्शनरी नहीं होती थी | ये डिक्शनरी विदेशियों के आने के बाद बनी भारत में | वहां कुछ root words थे गिने चुने, वहां कुछ pre-fix थे, कुछ suffix थे | root words में prefix, suffix लगा कर के ढेरों शब्द बन जाते थे | एक शब्द से 113×63 शब्द बन सकते थे और जैसे साइंस का नियम है दो चीजों को मिलाएं तो उनकी प्रॉपर्टीज नष्ट नहीं होंगी, मिलने के बाद | जैसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन मिलाएं तो पानी बन जायेगा लेकिन पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की प्रॉपर्टीज रहेंगी | ऐसे ही जो नये नये शब्द बनेगे उनमें जो बेसिक meaning है वो ख़त्म नहीं होगा | वो अंत तक बना रहेगा | कैसे बन जाते हैं शब्द मैं उदाहरण देकर बता देता हूँ |

‘ह्रीं’ धातु है संस्कृत में, जिस से हिंदी की एक धातु बनती है ‘हार’ | अब इस हार में हम prefix लगाते चले जाते हैं, दिखिए कितने शब्द बनते हैं | हार में ‘वि’ लगा दें तो ‘विहार’ बन जाएगा | इसी ‘हार’ में ‘आ’ लगा दें तो ‘आहार’ बन जाएगा यानी भोजन | इसी ‘हार’ में ‘प्र’ लगा दें तो ‘प्रहार’ बन जाएगा यानि ‘आक्रमण’ | इसी ‘हार’ में ‘उप’ लगा दें तो ‘उपहार’ यानि gift बन जाएगा | इसी ‘हार’ में ‘संग’ उपसर्ग लगा दें तो ‘संहार’ बन जायेगा | नये नये चाहे जितने शब्द बनाते चले जाओ | वहां डिक्शनरी की जरूरत ही नहीं थी, आप शब्दों के मतलब खुद निकाल सकते हैं, आपको केवल root words मालूम होने चाहिए, उनके meaning मालूम हों, prefix suffix मालूम हों और उनके meaning मालूम हों | Meaning निकाल सकते हैं और नये नये शब्द बना सकते हैं | जिन्दा language थी वो, आज की तरह से मरी हुई language नहीं थी | अब आप नये नये शब्द खुद नहीं बना सकते, अब आपको दूसरी language से शब्द borrow करने पड़ते हैं | वहां borrow नहीं करने पड़ते थे | ‘धृ’ धातु से धर्म बनता है, ‘धृ’ का अर्थ है, धारण करना और धर्म का भी अर्थ है जो  धारण किया जाता है | ‘धृ’ धातु से शब्द बनता है धरती | जो धारण करती है हम सबको | हमारी इन बिल्डिंग्स को, हमारे घरो को, हम सबको जो धारण किये हुए है | इसलिए इसको धरती कहती हैं | ‘धृ’ धातु से एक शब्द और बनता है, धैर्य, patience. ये धरती इसलिए धरती है क्योंकि इसमें patience है, कब से झेल रही है हमको | कितने कुदाल फावड़े चला रहे हैं, कितने बम फोड़ रहे हैं इसके ऊपर और क्या क्या नहीं कर रहे | ये वहीँ की वहीँ है | कितना patience है इसके पास | इसलिए ये धरती है, ये धर्म है, धैर्य, patience |

दूसरी चीज है धृति, क्षमा | Forgiveness, ये भी सब में होती है | आपका बच्चा खेलते हुए आता है, आपके बाल पकड़ कर खींच लेता है, आपका चश्मा खींच लेता है | आप forgive करते हैं, forgiveness तो है, सब में है, हर country के आदमी में है, हर religion के आदमी में है | ये है धर्म और ये यूनिवर्सल है | ये है human being की प्रॉपर्टीज  | ये है सनातन धर्म, religion is not धर्मं | ये religion को हमारे यहाँ सम्प्रदाय कहते थे, ये और बता दूं में आपको | फिर इन सम्प्रदायों के भीतर पंथ होते थे, Cult | इन पन्थो के भीतर फिर मत होते थे, जिसे ism कहते हैं आजकल | धर्म इनसे बिलकुल अलग चीज है | धर्म कोई ism नहीं है, धर्म कोई cult नहीं है, धर्म कोई religion नहीं है | धर्म वो है जो human being के अन्दर है | दूसरी चीज है क्षमा, forgiveness | सबके अन्दर होती है, ये और बात है कि हम उसे घटाते चले जा रहे हैं | वो हमारी क्षमा सुरक्षित कर रखी है हमने, अपने बच्चो के लिए है, दूसरों के लिए नहीं है | अपना बच्चा मूंछ खींच लेगा तो क्षमा है और पडोसी खींच लेगा तो लट्ठ चलेंगे | वहां नहीं है क्षमा हमारे पास | हम क्या कर रहे हैं उसे सिकोड़ते चले जा रहे हैं | यानि धर्म को अब नष्ट कर रहे हैं और जैसे जैसे धर्म नष्ट हो रहा है, मनुष्य नष्ट हो रहा है | ये ध्यान रखियेगा | मनुष्य क्षीण, कमजोर होता चला जा रहा है | मनुष्य की सारी शक्ति धर्म से ही होती है |

धृति, क्षमा, तीसरा जो है, दम | दम माने दमन करना, मारना, अपने को कण्ट्रोल करना, self control या कहिये self discipline ज्यादा सही शब्द है |  Self discipline, हम अपना तय कर लें कि हमको इस तरह से जाना है | लेकिन अब हम अपने मन को discipline में तो रखना ही नहीं चाहते | अब हमें discipline में रखने के लिए पोलिस की जरूरत पड़ती है, discipline में रखने के लिए कोर्ट की जरूरत पड़ती है | Discipline में रहना ही नहीं चाहते, वरना Self discipline भी human being की nature है, उसका धर्म है |

आस्तेय, बाहर-भीतर से एक सा | लेकिन जैसे जैसे सभ्यता का विकास होता चला जा रहा है, ये आस्तेय भी ख़त्म होता चला जा रहा है | बाहर भीतर से एक से नहीं रहे | अब तो जितना हम बाहर और भीतर में फर्क पैदा कर लेते हैं, उतने ही सभी कहलाते हैं | उतने चतुर कहलाते हैं, उतने diplomat कहलाते हैं, सबरी अकल उसी में मानी जाती है | हम बाहर भीतर से एक से तो हैं ही नहीं | सभ्यता का मतलब ही ये है कि आप अपनी असलियत छिपाइए और सभ्यता का कोई meaning नहीं है | सभ्यता का शब्द बनता है सभा से | आप सभा में बैठे हैं, मीटिंग में बैठे हैं, बहुत गंभीर discussion चल रहा है और आपको आ रही है हंसी | छिपाइए उसको, रुमाल निकालिए और मुंह पर ऐसे ऐसे लगाइये | आपको आ रही है छींक तो रोकिये, अपनी असलियत को बाहर मत आने दीजिये | नंगे पैर आओगे तो चप्पल पहन लीजिये, तब सभ्य माने जाओगे | मेरी बात समझ रहे हैं, नहीं समझ रहे हैं | हम अपने को आस्तेय, अपने को छिपाते चले जा रहे हैं | आप सोचिये, उस जमाने में, आदि मानव को जब गुस्सा आता होगा तो वो क्या करता होगा ? उसके पास नाखून थे, दांत थे, नाखूनों से नोचता होगा, दांतों से काटता होगा | जैसे जैसे सभ्य हुआ, पत्थर युग शुरू हुआ, उसने पत्थर के हथियार बना लिए | पत्थर मारना शुरू कर दिया उसने | और सभ्य हो गया, लोहे से हथियार बनाने लगा | अब गुस्से के लिए दांत और नाखूनों की जरूरत नहीं है उसको | अब वो सभ्य हो गया | और सभ्य हो गया, छुरा, चाकू चल गए | और सभ्य हो गया, बंदूके चल गयी, पिस्तौल चल गयी | सभ्य होता चला जा रहा है, एटम बम तक पहुँच गया आदमी, सभ्य होते होते | बाहर भीतर से एक से रहना, फितरत तो इंसान की यही है | ये धर्म है, सनातन, शुरू से यही रहा है | क्रोध आज भी आता है, बस उसको व्यक्त करने के, प्रकट करने के, तरीके बदल गए हैं | इंसान तो वही का वही है | बाहर जो आता है, वो भीतर छिपता नहीं है | बाहर तो वो आता है, फिर कितना भी छिपा लें आप | फिर किसी और तरीके से निकल कर आएगा | आस्तेय तो रहेगा, आस्तेय नष्ट नहीं होता | आस्तेय नष्ट हो जाएगा तो मनुष्य नष्ट हो जायेगा |

दमोस्तेयं, अगली चीज है शौच | शौच माने पवित्रता, purity | Purity बाहर और भीतर दोनों जगह कि की जाती है | आज बाहर की purity का तो बहुत ध्यान है, बहुत तरह के साबुन लगाए जाते हैं, शरीर को pure बनाने के लिए, पानी भी pure पिया जाएगा, distilled water लेंगे, mineral water लेंगे,  उस से भी काम नहीं चलता, उसे फिर boil भी करते हैं, मैंने यहाँ देखा है लोगों को | mineral water लेंगे और उसको फिर boil भी करेंगे और तब पियेंगे |  क्या meaning है ? इस शरीर की purity पर इतना ध्यान और भीतर जो बवाल भरा पड़ा है, उसमें जो impurity भरी पड़ी है, उसका ? उसका कोई ध्यान नहीं है | मन में कितना बवाल भरा पड़ा है, बुद्धि में कितनी बकवास भरी पड़ी है | उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं है | इस (हाथ से शरीर की तरफ इशारा करते हुए) कंप्यूटर में वायरस ज्यादा हैं और प्रोग्राम कम हैं, आज कल और वायरस इकट्ठे करे जा रहे हैं और वायरस रिमूवर भी कोई नहीं लगायेंगे | उसकी purity का कोई ख्याल नहीं है, न मन शुद्ध है, न बुद्धि शुद्ध है, न चित्त शुद्ध है, न अहंकार शुद्ध है |  ध्यान रखियेगा आत्मा शुद्ध नहीं होती कभी, आत्मा इन सब से अलग चीज है | ये भीतर की चारों चीजें जो इस शरीर को चलाने वाली हैं, वो सारी अशुद्ध हैं | Purity नहीं है | Complete Purity, बाहर और भीतर दोनों जगह से पवित्रता |

सवाहियाभ्यंतर शुचि – सवाहिया माने बाहर से, अभ्यंतर माने भीतर की,शुचि माने पवित्रता | दोनों जगह होनी चाहिए | imbalance है हमारी पवित्रता | ये भी धर्म है पवित्रता |

इन्द्रियनिग्रह, इन्द्रियों पर control. ये सबसे कड़ा काम है | दस इन्द्रियां हैं हमारे पास | पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, पांच कर्मेन्द्रिया हैं हमारे पास | नाम गिना दूं मैं, ग्यानेद्रियों का meaning है वो senses, वो body के पार्ट, जो हमको बाहर की दुनिया की जानकारी देते हैं | हमारे भीतर पहुंचाते हैं, आँख, किसी चीज के बारे में हम अगर जानते हैं तो देख कर जानते हैं या कान से सुन कर जान सकते हैं या हम जानते हैं नाक से सूंघ कर के कि ये गुलाब की खुशबू है, कि ये बेला की खुशबू है, कि ये चमेली की खुशबू है, या जीभ से चाख कर जान सकते हैं कि ये नमक है कि चीनी है या skin से touch करके जान सकते हैं कि hard है या soft है या hot है या cold है | ये पांच ही तरीके हैं जानने के | छठा कोई तरीका नहीं है, इसलिए हम इन्हें ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं | ज्ञान प्राप्त करने के ये पांच तंत्र हैं | इन ग्यानेद्रियों में सबसे ज्यादा sensitive आँख है और कोई ज्ञानेन्द्रिय इतनी sensitive नहीं है | कान, खूब सुनते हैं पर उतनी दूर की बात नहीं सुन सकते, एक लिमिट है लेकिन आँख की देखने के लिमिट कान के सुनने की लिमिट से ज्यादा है क्योंकि light की स्पीड ज्यादा है, sound की स्पीड से | सबसे ज्यादा चंचल इन्द्रिय है, सबसे ज्यादा sensitive इन्द्रिय है | सोते में भी ये पुतली हिलती रहती है, घूमती रहती है | Rapid Eye Sleep, घूमती हुई पुतली वाली नींद | इसी में सपने दीखते हैं, अगर पुतली घूमना बंद कर देगी नींद में तो सपना नहीं दिखेगा | इसी को गहरी  नींद कहते हैं, sound स्लीप कहते हैं | ये सोते में भी चैन नहीं लेती, घूमती रहती है | कितनी sensitive है और कितनी चंचल इन्द्रिय है | नतीजा sound स्लीप नहीं आ रही है, इस पर कंट्रोल नहीं है, इसीलिए | मैं देख रहा हूँ, लोग बड़े बड़े बढ़िया पलंग पर सो रहे हैं, sleeping pills भी खा रहे हैं, लेकिन नींद नहीं आ रही है | गहरी नींद नहीं आ रही है क्योंकि इन्द्रिय कण्ट्रोल में नहीं है | इन्द्रिय निग्रह, ऐसे ही sex organ सबसे ज्यादा sensitive इन्द्रिय है, वो जो पांच कर्मेन्द्रियां हैं, उनमे से | पांच कर्मेन्द्रियों में से sex organ सबसे ज्यादा sensitive इन्द्रिय है | इन दोनों को जिसने कण्ट्रोल कर लिया, समझ लो सारी इन्द्रियां कण्ट्रोल हो गयी |

इन्द्रिय निग्रह, वैसे अपनी इन्द्रियों पर थोडा या बहुत कण्ट्रोल करते सब हैं, चाहे वो हिन्दू हो, चाहे मुसलमान हो, चाहे ईसाई हो क्योंकि ये human being की nature है | हम किसी चीज को नहीं देखना चाहते, अच्छी नहीं लग रही है, बुरी लग रही है, नजर फेर लेते हैं | कण्ट्रोल तो होता है, इन्द्रियों पर | अपने हर organ पर हम नियंत्रण करते हैं | यही human being की nature है, क्वालिटी है, प्रॉपर्टी है |

धी, human being की सबसे बड़ी प्रॉपर्टी बुद्धि है, cognizance  | धी माने बुद्धि, cognizance. ये सबसे बड़ी प्रॉपर्टी है, जानवर में वो cognizance नहीं होती है, वो बुद्धि नहीं होती है, जो इंसान में होती है | वर्ना तो  जानवर और इंसान दोनों खाते हैं, दोनों गोबर करते हैं, दोनों बच्चे पैदा करते हैं, दोनों पैदा होते हैं, दोनों मर जाते हैं, कोई फर्क नहीं है, जानवर और इंसान में | इंसान के पास cognizance है, समझ है | ये भी एक human being की प्रॉपर्टी है, चाहे वो हिन्दुस्तानी हो,  चाहे मुसलमान  हो, सिख हो, इसाई हो, सबके पास ये है |

विद्या, subject knowledge, ज्ञान नहीं है विद्या का मतलब, ये ध्यान रखना | विद्या transferable प्रॉपर्टी होती है, ज्ञान transferable प्रॉपर्टी नहीं होती है |  ज्ञान कोई किसी को नहीं दे सकता, विद्या दी जा सकती है | इंजीनियरिंग, ये विद्या है, ज्ञान नहीं है | इंजीनियरिंग विद्या को सीख कर के आप कोई मशीन बना सकते हैं, कोई बिल्डिंग बना सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं पर एक ही काम कर सकते हैं  | जिस field की इंजीनियरिंग की है, केवल वही काम कर पायेंगे | एक सब्जेक्ट की knowledge है, इसे विद्या कहते हैं | ये transferable है, ये सिखाई जा सकती है | इसके लिए स्कूल, कॉलेज हैं | लेकिन जिसको हमारे यहाँ ज्ञान कहते हैं, वो सिखाया नहीं जा सकता | वो आपके भीतर है | आपको उसे reveal करना पड़ेगा, आपको उसे research करना पड़ेगा, आपको उसे discover करना पड़ेगा | सब आपके भीतर ही है | इस दुनिया में जो कुछ भी है, उस सबकी जानकारी भीतर मौजूद है, पहले से | उस सबकी प्रोग्रामिंग मौजूद है इस कंप्यूटर में | सिर्फ उसको जानने की जरूरत है, उसको जान इसलिए नहीं पाते क्योंकि वायरस घुसे पड़े हैं इस सिस्टम में | गड़बड़ ये हुई कि हम समझ ही नहीं पाए कि क्या क्या प्रोग्राम है हमारे पास | ज्ञान वो है जो हमारे भीतर है |

धी, विद्या, सत्य….. Truth. सत्य भी हर आदमी में है, थोडा या बहुत, सब में है | आप किसी भी religion को उठा लीजिये, चाहे ईसाइयों को ले लीजिये, चाहे मुसलमानों को ले लीजिये, चाहे हिन्दुओं को ले लीजिये या संसार का कोई भी धर्म ले लीजिये, कोई ये नहीं कहता कि ये सब चीज पैदा नहीं करो | सब कहते हैं कि इन सब चीजों पर नियंत्रण करो | सब कहते हैं सत्य बोलो, सब कहते हैं ज्ञान प्राप्त करो | कोई religion इनके विरोध में नहीं जाता, क्योंकि यही धर्म है | धर्म religion नहीं है, religion तो एक faith है | You are free to choose your God. इसलिए हिन्दुस्तान में तैंतीस करोड़ देवता हैं | हर आदमी free है, वहां पर अपना भगवान् चुनने के लिए | हर आदमी फ्री है, अपना religion चुनने के लिए | लेकिन जो religious leaders हैं वो कहते हैं… नो, नो, नो…. बस इसी धर्म को, किसी और धर्म की ओर देखना भी मत | वो पाप है | ये अभिमान हमारे भीतर पैदा कर रहे हैं |

धी, विद्या, सत्य….. Truth. सत्य को हम जाने | हम सत्य को भी नहीं जानते | बस भीतर प्रोसेस में है, क्योंकि प्रॉपर्टी है हमारी, सत्य है तो सही हमारे पास | हम पहचान नहीं रहे हैं अपने धर्म को | हम किसी चीज को नहीं पहचान रहे | तथ्यों को हम सत्य समझ रहे है | तीन terms हैं, हमारे यहाँ – तथ्य, सत्य और ऋत | ऋत के लिए अंग्रेजी में मुझे कोई शब्द नहीं मिला, तथ्य को तो अंग्रेजी में फैक्ट्स कहते हैं और सत्य को अंग्रेजी में truth कहते हैं | ऋत के लिए अंग्रेजी में मुझे कोई शब्द नहीं मिला, काम चलाने के लिए मैं ये कह सकता हूँ, Ultimate Truth. ये जो इन्द्रियां gain करती हैं, वो सत्य नहीं है | इन्द्रियों के through हम जो जानते हैं, वो सत्य नहीं है | वो तो केवल तथ्य हैं | आँख तो एक केमरा है, केमरा नहीं जानता, किसका फोटो खींच रहा हूँ | फोटो खींचने वाला जानता है कि ये किसका फोटो है ? केमरा नहीं जानता | केमरा नहीं जानता कि वो बदसूरत है या सुन्दर है | फोटो अच्छी आई है या खराब आई है | केमरा नहीं जानता | भीतर बैठा हुआ वो जान रहा है, मन ! इन्द्रिय, आँख जो मन को बता रही है वो सत्य नहीं बता रही है वो तथ्य बता रही है, वो fact दे रही है | मन  decide करता है कि what is Truth ? जैसे कोर्ट में दो lawyer अपने अपने फैक्ट्स रखते हैं और जज जजमेंट करता है, वो decide करता है, what is Truth, जब वो जजमेंट देता है | ये मन decide करता है उन फैक्ट्स में से truth को | जजमेंट गलत भी होते हैं | मन कभी कभी गलत भी truth निकाल लेता है | Truth भी गलत हो सकते हैं | जैसे हम शाम को धुंधलके में चले आ रहे हैं, दुखी मन से | रास्ते में एक रस्सी पड़ी है, हम सांप समझ लेते हैं | घबरा के अलग खड़े हो जाते हैं और कभी कभी हम बड़े खुश चले आ रहे हैं, वही शाम का धुंधलका है | Really सांप पड़ा हुआ है और हम रस्सी समझ कर उसे छलांग कर निकाल जाते हैं | आँख ने तो truth देखा नहीं, आँख ने तो फैक्ट्स देखे हैं | मन ने जो truth निकला वो भी wrong निकाल लिया | Wrong जजमेंट भी हो जाते हैं | आँख, ये जो इन्द्रियां हैं, ये फैक्ट्स collect कर के मन को देती हैं और मन उनमें से truth निकालता है | फिर उस truth को मन, बुद्धि के पास, cognizance के पास भेजता है | बुद्धि उसमें analyze करके ऋत निकालती है, which is ultimate truth. वो है सत्य, जब तीनो level से आप गुजर जाएँ, तब समझिये कि आप सत्य तक पहुच गए | लेकिन हमें जल्दी इतनी है कि हम तथ्यों को ही सत्य मान लेते हैं | कभी कभी मन तक चला जाता है, बुद्धि तक तो जाने ही नहीं देते | हमारे यहाँ कहा गया है सत्य के बारे में –

सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यमप्रियम | प्रियं च नानृतं ब्रूयात, एष धर्म सनातन |

सनातन धर्म कह रहा है कि सत्यम  ब्रूयात, सच बोलो | प्रियं ब्रूयात, लेकिन वो सच जो है वो मीठा होना चाहिए | Speak always truth and that truth should be sweet. सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यमप्रियम, अगर वो hard है, बुरा लग रहा है किसी को तो ऐसा सच मत बोलो | न ब्रूयात, मत बोलो, सत्यमप्रियम, बुरा लगने वाला | लेकिन लोग क्या कहते हैं, जान बूझ कर ऐसा बोलेंगे कि दुसरे की फीलिंग hurt हो और बोलते हैं, हम तो सच्ची बात बोल रहे हैं अब तुम्हें बुरी लग रही है तो हम क्या करें ? सच्ची बात तो बुरी लगती ही है | अरे ! हम सत्य बोल रहे हैं ? सत्य बोल ही नहीं रहे | (श्रोताओं में से एक – सत्य तो कडवा होता है ), सत्य कभी कडवा नहीं होता (वही श्रोता – नहीं, नहीं, लोग बोलते हैं ऐसा ) | सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यमप्रियम | फिर आगे कहते हैं, देखिये – प्रियं च नानृतं ब्रूयात, वो सत्य हो, मीठा हो लेकिन नानृतं ब्रूयात, अन ऋत नहीं हो | यानि उसमें ultimate truth होना चाहिए | अपनी बुद्धि से, cognizance से उसको analyze किया जाना चाहिए | तब बोलिए, क्या क्या चीज देखनी है उसको बोलने से पहले, किसके सामने बोल रहे हैं ? किस time में बोल रहे हैं ? क्यों बोल रहे हैं ? इसको कैसा लगेगा ? ये सारी बातें सोचनी चाहिए | क्या हम बोलने से पहले, जिसे हम सत्य कहते हैं, ये सब बातें सोचते हैं ? हम नहीं सोचते हैं |

हो सकता है मन ने जो truth निकला हो वो एक टाइम में सही हो और आज वही truth गलत हो | हमें टाइम का ख़याल रखना पड़ेगा | वो ऋत होना चाहिए सत्य | प्रियं च नानृतं ब्रूयात – वो सत्य प्रिय भी हो लेकिन अनऋत नहीं हो | एष धर्म सनातन – ये सनातन धर्म है | सत्य जो है वो धर्म है, वो जो दस चीज गिना रहा हूँ, वो सत्य धर्म है |

धी, विद्या, सत्य और दसवां अक्रोध – गुस्सा न आना |  forgiveness होगी तो गुस्सा नहीं आएगा, ये है धर्म, जिसकी हम बात करते हैं, भारतीय धर्म की जब हम बात करते हैं, सनातन धर्म की जब हम बात करते हैं | This is Sanatan Dharm, These religions are not Dharm, Religion का मतलब होता है सम्प्रदाय, इन सम्प्रदायों में फिर पंथ हैं बहुत से | शैव religion में पंथ मैं बताऊ आपको, शंकराचार्य का अलग पंथ था और बाद में और भी पंथ निकले इसमें से | बौद्ध धर्म में भी दो पंथ हुए, हीनयान और बदरियान, दो शाखाएं बनी |  जैनों में भी श्वेताम्बर और दिगंबर | उनमें भी शाखाएं बन गयी | ईसाई में, कथोलिक और कौन कौन से हैं वो प्रोटेस्टेंट हैं, इनमें भी दो शाखाएं बनी | ये पंथ कहलाते हैं, cult. इनमें भी फिर ism यानि मत निकलते हैं | वैष्णव में से तो इतने पंथ और इतने मत निकले हैं, वैष्णव religion में से, शायद संसार के किसी religion में से इतने पंथ और इतने मत नहीं निकले होंगे, जितने वैष्णवों में निकले हैं | वैष्णव में राम को मानाने वालों का अलग पंथ है, कृष्ण को मानने वालों का अलग पंथ है | सीधे विष्णु को मानने वालों का अलग पंथ है | सत्य नारायण, हमारे यहाँ सत्य को भी नारायण माना जाता है, वो एक अलग पंथ है | सत्यनारायण की पूजा होती है | २४ तो अवतार ही हैं विष्णु जी के | इतने पंथ निकले हैं इन सम्प्रदायों में से और फिर एक एक पंथ में इतने ism निकले हैं, इतने मत हैं उसमें | गौणीय मत अलग है, बल्लभ मत अलग है, बल्लभाचार्य का, बल्लभ सम्प्रदाय कहलाता है वो | अब वो अपने मत को सम्प्रदाय बोल देते हैं | religion बता देते है | अब मत भी religion बन रहे हैं जैसे छोटे छोटे राजा अपने को सम्राट declare कर देते थे | छोटा सा नवाब अपने को कोई कह दे कि मैं बादशाह हूँ | ये स्थिति अब मतों की हो रही है, वो भी अपने को religion declare कर रहे हैं | आदमी का faith किसी एक जगह जरूर होना चाहिए | religion is must but religion is a faith. religion is not धर्म और वो एक ही जगह होना चाहिए, दो जगह नहीं होना चाहिए क्योंकि faith दो जगह हो ही नहीं सकता | इसका relation, faith का relation जो है, वो हमारे emotion से है | emotion अगर खंडित होंगे, प्रेम, हर religion प्रेम की बात करता है, चाहे वो शैव हो, चाहे वैष्णव हो, चाहे शाक्त हो, चाहे जैन हो, चाहे बौद्ध हो, चाहे सिख हो, चाहे क्रिश्चियन हो, चाहे इस्लाम हो | सब प्रेम की बात करते हैं और प्रेम दो जगह नहीं हो सकता, प्रेम एक ही जगह हो सकता है | दो जगह होते ही तो वो खंडित हो जायेगा | फिर समर्पण नहीं रहेगा | इसलिए religion should be one, faith should be one and in India you are free to chose your GOD.

33 करोड़ हैं, चाहे जिसको छांट लीजिये, जो आपको अच्छा लगता हो, जिस में आपका मन सबसे ज्यादा लगता हो, उसको छांट लीजिये, उस एक की पूजा कीजिये लेकिन आज आदमी के पास ईश्वर के लिए विश्वास नहीं है, God faith नहीं है, God fearing है | डर रहा है इसलिए इसकी भी पूजा, उसकी भी पूजा, देवी माता की भी पूजा कर रहा है, शंकर जी की भी पूजा कर रहे हैं, विष्णु जी की भी पूजा कर रहे हैं, सब की पूजा कर रहे हैं एक तरफ से | God fearing है, love किसी को नहीं है, भगवान् से प्रेम किसी को नहीं है | किसी को भगवान् के प्रति आस्था नहीं है, किसी को भगवान के प्रति श्रद्धा नहीं है | ये तो बात हो गयी religion की और आदमी की इन कमजोरियों का और ये जो नाजानकारियाँ है इसका फायदा कुछ चतुर लोग उठाते हैं, वो धर्म के ठेकेदार, वो businessman और वो politician उठाते हैं | बाकी तो भेड़-बकरी हैं, आते जाते हैं, उन्हें अपने follower चाहिए, धर्म के ठेकेदारों को अपने follower चाहिए इसलिए रोज नए religion बना लेते हैं | एक महात्मा आ जाता है वो अपना नया  अलग religion तैयार कर देता है, सब लोग अपना अपना पंथ बनाते चले जा रहे हैं और अपने अपने follower बनाते जा रहे हैं |

एक श्रोता का प्रश्न – आपने ये जो दस quality बताई हैं और कितनी क्वालिटी होती हैं, human being की ? जैसे शक, डर, प्रेम, श्रद्धा, ये इन्ही दस में आ जाते हैं क्या ? क्योंकि ये भी तो क्वालिटी ही है human being की ?

 To Be Continued…….

April 19, 2018

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