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सद्गुरु कौन है और गुरु की आवश्यकता भाग-1

Guru kaun hai

विषय प्रारूप (वर्गीकरण ) –

१. गुरु की महिमा   २. गुरु के प्रकार         ३. देवता का अर्थ                    ४. गुरु शब्द का अर्थ

५.  ज्ञान क्या है ?    ६. माया क्या है ?      ७. गुरु का क्या काम है ?         ८. हमने माया को कैसे पकड़ रखा है ?

९.  माया के विभिन्न सामाजिक उदहारण १०. माया से कैसे बचें  ?        ११. गुरु कौन है ?

१२. गुरु कैसा होना चाहिए ?                     १४. सुख दुःख क्या हैं ?          १५. दशरथ का literal meaning

१६ सुखी कौन है ?                                    १७. मन कैसे शुद्ध हो ?           १८. गुरु की पहचान

१९. शिष्य के प्रकार                                  २० मूर्ख कौन है ?                  २१ श्रद्धा का meaning

सद्गुरु कौन है और गुरु की आवश्यकता

(कनाडा में हुए संवाद का यथारूप)

आज गुरु पूर्णिमा का पर्व है और ये संयोग है कि गुरूवार भी है । गुरूवार, बृहस्पतिवार एक नाम के दो रूप हैं । ये संयोग ही है कि गुरु पूर्णिमा के पर्व पर आज गुरूवार भी है । गुरु  इस पृथ्वी पर साक्षात देवता होता है । और सब देवताओं को आप अनुभव करते हैं पर गुरु को साक्षात देख सकते हैं, साक्षात देवता है । थोड़ी सी मैं गुरु की महिमा कहूँगा, फिर बताऊंगा गुरु के बारे में । गुरु के सम्बन्ध में सबको याद होगा बड़ा प्रसिद्ध श्लोक है

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विश्नो गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरु साक्षात् परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ।

अखण्डमंडलाकारं व्याप्तंयेन चराचरम, यत्पदम दर्शयते येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

अर्थ भी सब जानते हैं । गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विश्नो गुरुर्देवो महेश्वरः – गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान् शंकर है । त्रिदेव, गुरु में तीनो देवता निवास करते हैं । गुरु साक्षात् परम ब्रह्म – गुरु साक्षात् (स-अक्षात) मतलब आखों के सामने, गुरु आखों के सामने है और देवता दिखाई नहीं देते । गुरु साक्षात् परम ब्रह्म – वो जो परब्रह्म है, ultimate god है, जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश से भी ऊपर है, गुरु वो है और साक्षात रूप में है । तस्मै श्री गुरवे नमः – इसलिए ऐसे श्री गुरु को मैं नमस्कार करता हूँ । अखण्डमंडलाकारं व्याप्तंयेन चराचर – इस चर और अचर सृष्टि में (चर सृष्टि – वो सृष्टि जिसमें movement होता है । यानी जितनी भी living चीजें हैं वे सब चर सृष्टि कहलाती हैं । उन सब में movement होता है, जितने भी आदमी है, जानवर है, जितने भी कीड़े मकोड़े हैं, सब चर सृष्टि हैं और दूसरी सृष्टि है अचर । अचर को जड़ सृष्टि भी कहते हैं । जो non-living rocks हैं, पहाड़ हैं, पेड़ हैं, ये चल नहीं सकते, इनमें मूवमेंट नहीं हैं ।)  तो अखण्डमंडलाकारं व्याप्तंयेन चराचर – जो अखण्डमंडलाकार, अखंड माने जो कहीं से खंडित नहीं है, कहीं से टूटा नहीं है, ऐसा मण्डल आकार वाला (गोल), वो जो ब्रह्म है ultimate god है, वो ultimate god, व्याप्तंयेन चराचर – इस living  और non living जितनी भी सृष्टि है, जितनी भी universe है, उस सबके भीतर वो निवास करता है, रहता है । यत्पदम दर्शयते येन तस्मै श्री गुरवे नमः – उस ब्रह्म को जो सबके भीतर मौजूद है, चर में भी और अचर में भी, living  में भी, non living में भी, moveable में, non  moveable में, सबमें जो है, वो ब्रह्म जिसके चरणों में दिखलाई देता है । यत्पदम – यत  माने जिसके, पदम् माने पैरों में, दर्शयते – दिखायी देता है । ऐसे, तस्मै माने ऐसे श्री गुरवे नमः – श्री गुरु को मैं नमस्कार करता हूँ ।

गुरु की महिमा भारत वर्ष में सब वेदों ने, शास्त्रों ने, पुराणों  ने, सब संतों ने, सब ऋषियों ने, मुनियों ने, सब ने गुरु की महिमा गायी है । सब कहते हैं की साक्षात् ईश्वर, साक्षात् ब्रह्म इस पृथ्वी पर गुरु ही है । कबीर ने तो यहाँ तक कहा कि

गुरु गोबिंद दौउ खड़े, काके लागों पांय, बलिहारी गुरु आपने गोबिंद दियो बताय ।

गुरु भी खड़े हैं और गोविन्द भी खड़े हैं (भगवान् भी खड़े हैं), शिष्य सोचता है किसके पैर छूने  चाहिए पहले । फिर शिष्य सोचता है की बलिहारी गुरु आपने मैं पहले गुरु के पैर छूऊंगा क्योंकि गुरु ने गोबिंद दियो बताय – इन्हीं ने बताया की ये गोविन्द है, यही पहचान कराते हैं अन्यथा, अन्यथा तो मोती हमारे हाथ में है, हीरा हमारे हाथ में है, हम पत्थर समझ कर उसे फ़ेंक देते हैं, अगर हमारे पास समझदारी नहीं है, ज्ञान नहीं है । गुरु का काम है, ज्ञान प्रदान करना । मनुष्य के प्रत्येक के चार गुरु होते हैं । प्रत्येक के पास होते हैं चार गुरु । आज गुरु पूर्णिमा पर हम जिस गुरु की बात करेंगे, वो पांचवा गुरु है ।

चार गुरु, सबसे पहले गुरु  माता है । जिसने हमको उठना बैठना सिखाया, खाना पीना सिखाया, वो सबसे पहली गुरु है । दूसरा गुरु हमारा पिता है जिसने चलना फिरना सिखाया, व्यवहार करना सिखाया, बोल चाल सिखाई । तीसरा गुरु वो अध्यापक (Teacher) है, जिसने alphabet  पढाई, पढना लिखना सिखाया, ABCD पढाई, अ,आ,इ, ई पढाई और चौथे गुरू सबके होते हैं उसके मित्र (Friends) । जो माता पिता नहीं सिखाते, जो teacher नहीं सिखाते, वो Friends सिखाते हैं । वो भी गुरु हैं । ये चार प्रकार के गुरु हर व्यक्ति के पास होते हैं । मित्रों की भी बहुत जरूरत होती है, जो कोई नहीं सिखाता, वो उसको सिखाते हैं । मित्रों का होना जरूरी है, इस दुनिया में रहना है तो ।

पांचवा गुरु किसी किसी को मिलता है, वो पांचवा गुरु होता है सद्गुरु । वो बड़े भाग्य वाले को ही मिलता है । ऐसे ही गुरु के लिए कहा गया की गोविन्द को छोड़ कर उस गुरु के पैर छुओ पहले, उस सद्गुरु के लिए । वो है गुरु ।  वो क्या देता है ? ज्ञान देता है । हमारे यहाँ बताया जाता है, एक समावर्तन संस्कार होता है, जो सोलह संस्कार होते हैं, जो वेदों ने बताये हैं, उनमें से एक संस्कार होता है, समावर्तन संस्कार । उस समावर्तन संस्कार में, ये शिक्षा दी जाती है विध्यार्थी को, बच्चे को । सबसे पहली शिक्षा होती है – मातृ देवो भवः, माता देवता है । दूसरी शिक्षा है – पितृ देवो भवः, पिता देवता है और तीसरी शिक्षा आती है – गुरु देवो भवः, गुरु देवता है । देवताओं का नाम नहीं आता उसमें कहीं भी । फिर वेद बताते हैं, जब बच्चा ये सब सीख जाता है तब उसे बताया जाता है, अग्निर्देवता, वातो देवता, सूर्यो देवता, चन्द्रमा देवता, वसवो देवता, रुद्रा देवता, मरुतो देवता, विश्वेदेवा देवता, बृहस्पति देवेतेंद्रो देवता, वरुणो देवता । ये वेद में मंत्र है ।

देवता का अर्थ है देने वाला । The Giver. जो देता है वो देवता है । सबसे पहली देवता माता है, वो जन्म देती है । इसलिए वहां समावर्तन संस्कार में सबसे पहले बताया जाता है मातृ देवो भवः । दूसरी preaching होती पितृ देवो भवः । तीसरी preaching होती है गुरु देवो भवः । माता जन्म देती है, वो देवता है । पिता के बिना जन्म नहीं हो सकता है, वो भी जन्म देता है इसलिए वो भी देवता है । गुरु ज्ञान देता है इसलिए वो भी देवता है । और फिर जो वेद बतलाते है अग्निर्देवता, अग्नि भी देवता है क्योंकि वो हमको Heat देती है, LIght  देती है । सूर्यो देवता – Heat & Light देता है । चन्द्रमा देवता, हमको light & coolness देता है । जो हमको कुछ भी देता है, हम उसको देवता कहते हैं । हम उसके लिए Thankful होते हैं । अगर हम thankful नहीं हों, तो हम कृतघ्न हैं इसीलिए हमारे भारत वर्ष में गाय तक की पूजा करते हैं क्योकि गाय भी हमको दूध देती है । अपने बच्चे के हिस्से के दूध छोड़ कर के हमको दे देती है । इसलिए उसको माँ मानते हैं क्योंकि माँ ही दूध पिलाती है, गाय भी दूध पिलाती है  इसलिए गाय हमारी माँ है । तो गुरु देवता है ।

अब, माता तो एक बार जन्म दे देती है ।  पिता भी एक बार जन्म दे देता है । गुरु, वो, ज्ञान जो देता है, वो अनवरत देता है, निरंतर देता है, लगातार देता है । वो आपके सामने हो, न हो, वो ज्ञान दे सकता है । जरूरी नहीं की सामने हो । आज के युग में, आज के जमाने में  ये थोडा मुश्किल है । आज कल गुरु का सामने बैठना जरूरी हो गया है । मैं बताऊंगा, क्यों जरूरी हो गया है । गुरु शब्द का जो literal meaning  है उसका संस्कृत में अर्थ होता है बड़ा (Great) । जो हमसे Great है, जो हमसे बड़ा है वो गुरु है । इसलिए माता पिता भी गुरु है, क्योंकि वो बड़े हैं । किस चीज में बड़े हैं, उम्र में बड़े हैं, आयु में बड़े हैं, experience में बड़े हैं । गुरु किसलिए बड़ा है ? वो knowledge में बड़ा है, knowledge में great है । किसी भी field में कोई हमसे बड़ा है, वो गुरु है । उसकी greatness ये होती है किसी भी गुरु की, चाहे वो माता हो, चाहे वो पिता हो, चाहे वो ज्ञान देने वाला गुरु हो, उसके पास जो भी है वो देता है । यही उसकी greatness है । माता पिता के पास जो कुछ है, सब बच्चों को ही तो देते हैं । अपने साथ कोई माता पिता कुछ लेकर नहीं जाता । सब बच्चों के लिए छोड़ जाता है । गुरु की भी greatness इसी में है की वो ज्ञान दे । अगर वो ज्ञान नहीं देता तो उसमें greatness नहीं है फिर वो गुरु नहीं है, गुरु कहलाने लायक नहीं है ।

क्षमा कीजियेगा, मैं देखता हूँ, बहुत से लोग गुरु बनाते हैं । कान में मन्त्र फुंका लेते हैं, उसके बाद गुरु जी चले जाते हैं अपने घर, शिष्य जी चले जाते हैं अपने घर । फिर न पलट कर गुरूजी शिष्य की ओर देखते हैं और न ही शिष्य कभी गुरु का पता लगाता है । एक दूसरे से मिलते भी नहीं है । समझते हैं की उद्धार हो जायेगा, कल्याण हो जायेगा । कल्याण नहीं होने वाला  । कल्याण तभी होगा जब गुरु से आप कुछ लेंगे और गुरु वही है जो आपको देता है । जो अपने ज्ञान को share नहीं कर रहा आपके साथ, वो गुरु कहलाने का हकदार नहीं है । वो गुरु नहीं है । वो पाखंडी हो सकता है । गुरु always हमेशा अपने ज्ञान को आपसे share  करेगा । आप भी शिष्य तभी कहलायेंगे जब गुरु से ज्ञान लेंगे । यदि आपने गुरु से ज्ञान नहीं लिया तो आप शिष्य कहलाने के अधिकारी नहीं है । आप झूठा drama कर सकते हैं की मैं तो मंत्र फुंका कर शिष्य बन गया और झूठा गुरु ड्रामा कर सकता है की हमने तो मन्त्र दे दिया, हम तो गुरु बन गया । इस से कुछ नहीं होगा । ये भ्रम है की कान में मन्त्र फुंका लेने से या गुरुमंत्र लेने से कुछ हो जायेगा । कुछ नहीं होगा । होगा तब जब ज्ञान होगा ।

कबीर ने कहा है

माया दीपक नर पतंग, भ्रम भ्रम इवे पड़ंत । कहँ कबीर गुरु ज्ञान ते, एक आध उबरंत । ।

जब हम दीपक जलाते हैं, कैंडल जलाते हैं तो कीड़े उड़ उड़ कर उसके चक्कर लगते हैं, उसके चारों ओर घुमते हैं । पतंगा कहते उस कीड़े को । और वो पतंगा उस flame के चारों ओर घूम घूम कर उसी flame में गिर कर मर जाता है । संत कबीर कहते हैं कि माया दीपक नर पतंग – इस संसार के भीतर जो माया है यही दीपक है, ये flame है, ये मोमबत्ती जल रही है । और नर, मनुष्य, मनुष्य कौन है ? वो पतंगा है जो इस माया के चारों ओर घूम रहा है, इस दीपक के चारों ओर घूम रहा है । माया दीपक नर पतंग, भ्रम भ्रम इवे पड़ंत – भ्रम भ्रम के, घूम घूम के उसी में गिर जाते हैं और फिर उसी में मर जाते हैं । कहँ कबीर गुरु ज्ञान ते, कबीर कहते हैं गुरु का ज्ञान  मिलने पर, एक आध उबरंत – एक आध ही उबरता है । हजारों, करोड़ों, खरबों आबादी है इस संसार की, सब माया में डूबे जा रहे हैं, सब माया में मर रहे हैं । एक आध, कोई-कोई बच पाता है इस माया से, जिसको गुरु का ज्ञान मिलता है । गुरुमुख तो हजारों, लाखों हो सकते हैं, कान में मन्त्र फूंका कर के, ज्ञान नहीं ले सकते ।

ज्ञान क्या चीज है ? सबसे पहला ज्ञान है, words  के meaning जानो । ये दोहा जो मैंने आपको सुनाया, हो सकता है आपमें से बहुतों को याद हो, बहुत सारी books में भी लिखा होगा । लाखों लोग पढ़ते हैं । मैं देखता हूँ कि, बहुत से मंदिरों में मैं गया हूँ, लोग कीर्तन गाते हैं, बड़े बड़े सुंदर सुंदर कीर्तन गाते हैं, लोग झूमते हैं । लेकिन न कीर्तन गाने वाला उसका meaning जानता है और न सुनने वाले जानते हैं । जैसे बीन के आगे सांप अपना फन ऐसे ऐसे करता रहता है ऐसे कीर्तन सुन सुन कर के लोग अपना सर हिला देते हैं । Meaning नहीं समझते । Meaning समझने की जरूरत है । मैंने भी सुना दिया माया में सब  फंसते हैं, कोई एक आध बचता है माया से । माया है क्या चीज ? आप पहचानेगे कैसे माया को ? कि माया है तभी तो आप बचेंगे माया से ।   Words बोल देना, शब्दों को बोल देना बहुत आसान है, उनका meaning समझना । गुरु का duty है कि वो पहले आपको एक एक word का meaning समझाए ।

माया दीपक नर पतंग – माया दीपक है, जिसमें मनुष्य रुपी पतंगा गिर रहा है घूम घूम कर के, जल जल कर के नष्ट हो रहा है । सब संत कहते हैं मनुष्य माया में फंसा है । सब संत महात्मा, पंडित कहते हैं – माया से बचो और जो माया से बचो कहते हैं, वो खुद माया में फंसे रहते हैं । आज कल तो हालत ये है कि

सद्गुरु तो मिलते नहीं, मिलते गुरु-घंटाल, पाठ पढ़ायें त्याग का, स्वयं उड़ावें माल ।

दूसरों को बताते हैं कि त्याग करो और खुद पैसा बटोर बटोर कर ५ स्टार आश्रम बना रहे हैं । माफ़ कीजियेगा मैं कड़वी बात कह रहा हूँ, पर सच्ची बात कह रहा हूँ । दूसरों को कहते हैं कि माया से बचो और खुद माया में फंसे हैं । क्यों ? क्योंकि वो खुद नहीं जानते कि माया क्या चीज है ? वो दूसरों को माया से क्या उबारेंगे ? ऐसे लोग अगर गुरु होंगे तो फिर माया से कोई बचने वाला नहीं है । कबीर ने कहा –

जा का गुरु है आंधरा, चेला निरा निरंध – जिसका गुरु अँधा है और चेला भी अँधा है । दोनों माया में फंसे पड़े हैं आज कल ।  जा का गुरु है आंधरा, चेला निरा निरंध, अंधे अंधा खेलिया, दोनों कूप पडंत । जिसका गुरु भी अँधा है और चेला भी अँधा है तब क्या होगा ? अँधा अंधे को धक्का देगा और रास्ता बताएगा की चल मैं तुझे रास्ता बताता हूँ । क्या अंधा अंधे को निकाल देगा ? दोनों कूप पडंत – दोनों कुँए में गिर जाते हैं क्योंकि दिखाई तो देता नहीं है, दोनों में से किसी को । यही हो रहा है आज कल । सबसे पहली बात यह है कि आप जो शब्द बोलते हैं, जो चीज सुनते हैं, उसको समझें, उसका meaning जानिये ।

माया । गुरु का काम है कि पहले माया को काटे । जब माया कटेगी तब ज्ञान प्राप्त होगा । जब तक माया रहेगी, ज्ञान नहीं मिलेगा । माया है, हम जो  assumption करते हैं, बहुत सी चीज हम assume करते हैं । हम बहुत सी चीज presume करते हैं, हम अपने भीतर बहुत से illusions पालते हैं और कभी कभी delusions  भी पाल  लेते हैं । मान लेते हैं, कि ये ऐसा है । कैसे कैसे मान लेते हैं ? एक जन बताये, स्त्री माया है, इस से दूर रहो । ये illusion है, भ्रम है । कोई बताता है कि पैसा माया है, इस से दूर रहो, छोड़ो इसको, त्यागो । ये भी illusion है । कोई चीज माया नहीं है दुनिया में । कोई बताता है की माया हमको पकडे है । इंसान को माया ने पकड़ रखा है । माया ने किसी को नहीं पकड़ा है, पकड़ता है इंसान माया को । कबीर जी ने बताया है मनुष्य पतंगा है और चक्कर काट रहा है माया रुपी दीपक के, हटना नहीं चाह रहा वहां से, और फिर माया में गिरता है जा कर । माया नहीं पकड़ती है, दीपक किसी पतंगे को नहीं पकड़ता है, जलाने के लिए । पतंगा दीपक में जाता है जलने के लिए । ईश्वर ने माया बनायीं है, हमको भी बनाया है । हमको माया में डाला  नहीं है । माया में हम गिरते हैं । कैसे गिरते हैं ? तुलसीदास जी ने रामायण में लिखा है –

ईश्वर अंश, जीव अविनाशी – ये जो हमारे अन्दर जीव बैठा है, ईश्वर का अंश है, अविनाशी है । इसका नाश नहीं होता क्योंकि ईश्वर का नाश नहीं होता । ये ईश्वर का ही part है तो ये भी नष्ट नहीं होगा । ईश्वर अंश, जीव अविनाशी – ये जीव ईश्वर का अन्श है, अविनाशी है लेकिन हुआ क्या है ? गड़बड़ क्या है ? गड़बड़ ये है कि सो माया बस भयऊ  गुंसाई – तुलसीदास जी कहते हैं  कि वो जीव माया के चक्कर में फँस गया है । कैसे फँस गया है, example दे कर समझाते हैं । अब वो example आप समझेंगे तो बात clear हो जाएगी । example क्या देते हैं कि बंधो कीट मरकट की माहीं – जैसे भृंगी कीड़ा होता है, जैसे पतंगा होता है, दीपक के चारों ओर घूमता है वैसे ही इस माया से खुद जीव बंधता है आकर । माया जीव को नहीं पकड़ती और दूसरा example दिया कि मरकट की माहीं – मरकट माने बन्दर (Monkey ) । बन्दर की तरह से बंधा है । फंसा रहता है इसमें । कैसे ? बन्दर कैसे फंसता है ? एक बन्दर रहा, भूखा । एक लोटे में चने रखे हुए थे । चना तो जानते होंगे आप । लोटे भी देखे होंगे आपने । बन्दर आया, भूखा था उसने लोटे में हाथ डाल दिया, चने उठाने के लिए । मुट्ठी भर ली चने से । पूरी मुट्ठी अच्छी तरह से भर ली कि पूरा पेट भर कर खाऊंगा । थोडा नहीं लेना है इसमें से । पूरी मुट्ठी भर के जब हाथ बहार निकाला लोटे से तो लोटे का मुह तो छोटा होता है, तो उसका हाथ बाहर नहीं निकले लोटे से । अब बन्दर ऐसे ऐसे करे खूब उछले पर हाथ नहीं निकले । बन्दर भागे तो लोटा भी साथ साथ जाए । बन्दर सोचता है की लोटे ने उसका हाथ पकड़ा है । अब आप सोचिये की क्या लोटे ने हाथ पकड़ा है या बन्दर ने लोटे को पकड़ा है । अगर वो बन्दर चना छोड़ दे, तो लोटा छूट जायेगा । बस ! माया ने हमको नहीं पकड़ा है, हमने माया को पकड़ रखा है ।

हमने माया को कैसे पकड़ रखा है ? हम माया के चार रीज़न में पकडे हुए हैं । Assumption, Presumption, Illusion and delusion. हम wrong  assumption  करते हैं, wrong  presumption करते हैं । illusion का मतलब तो भ्रम होता ही है  और delusion  तो पागल लोगों में होता है आप जानते हैं । ये चार चीजें हमको माया में फंसाती है । कैसे कैसे illusion होते हैं ? यहाँ से जाओगे मोटर में बैठ कर, सन फ्रांसिस्को आने पर कहेंगे की लो सन फ्रांसिस्को आ गया । अरे भाई ! सेन फ्रांसिस्को तो जहाँ था वही है, आप वहां पहुंचे हैं । लेकिन आदमी उल्टा बोलता है कि सेन फ्रांसिस्को आ गया । सोचिये, कितना बड़ा भ्रम है, कितना बड़ा illusion है । सब कोई ऐसे ही बोलते हैं, गोरा भी ऐसे ही बोलता है, हिंदुस्तानी भी ऐसे ही बोलता है, सब इसी तरह बोलते हैं । ये illusion ही माया है । ये माया हमको फंसाती है । ये माया कैसे फंसाती है  ?

अभी मैं कल एक जगह कथा सुना रहा था, रामायण की । वहां प्रसंग चल रहा था भरत  मिलाप का । दशरथ राजा  ने देखा कि उसका बाल सफ़ेद होने लगा है, कनपटी का । सोचा, अब बूढा हो गया हूँ । अब हमको retire हो जाना चाहिए । रिटायर हों, तो राज पाट कौन संभालेगा, तो सोचा राज पाट के लिए सबसे बड़ा बेटा राम है, Qualified है, अच्छा है, होशियार है, योग्य है, सज्जन है, धर्मात्मा है, इसको राज पाट देना चाहिए ।   अपने मन की बात राजा दशरथ राज्य सभा में जा कर बताया । जितने सभा में लोग थे, गुरु वशिष्ठ, वाम देव जो उनके कुल का पुरोहित था, सब ने दशरथ की बात को बताया Right, बहुत अच्छा किया । जब सब yes कर दिए, सब accept कर लिए तो दशरथ ने declare कर दिया कि अमुक दिन राम के राजतिलक होगा और हम वन में चले जायेंगे । वसिष्ठ मुनि से date fix कराया और date declare कर दिया । सब को पता लग गया, सब जन जिसने भी सुना, बड़ा ख़ुशी, कि राम के राज तिलक होगा । एक young आदमी के हाथ में सारा kingdom आएगा । नए विधि से काम करेगा, दशरथ तो अब बूढा हो गया है । सब बड़ा खुश । घर में सब लोग खुश, बाहर town में सब लोग खुश, जनता सारी खुश ।

But जिस दिन राज तिलक होने को आया, उस से एक दिन पहले रात में कैकई माता वरदान मांगने लगी, दशरथ जी से । बोली, कि नहीं, राम के राजतिलक नहीं होगा, मेरे लड़के भरत के राजतिलक होगा । दशरथ बड़ा समझाया कि अभी भरत इतना smart नहीं है कि राज काज संभाल ले । पर वो नहीं मानी । टस से मस न हो । आखिर में दुखी हो कर दशरथ ने accept कर लिया कि ठीक है, भरत का ही राजतिलक होगा । but  कैकई माता को तो दूसरा वरदान भी चाहिए था । बोली, कि मुझे केवल भरत का राजतिलक नहीं चाहिए बल्कि राम को घर से निकालो, वनवास दो । क्यों ? क्यों, कैकई ने वनवास माँगा ? अपनी तरह से सोचिये जैसे हम अपने बारे में सोचते हैं । हम भी तो ऐसे ही सोचते हैं, अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता । अपना काम बनना चाहिए । हमारे लड़के का राजतिलक होना चाहिए, हमारा काम बनना चाहिये । मैं राज माता बनूँगी । अगर मेरा लड़का राजा बनेगा तो मैं भी राज माता बनूँगी । राम बन जायेगा तो कौशल्या राज माता बन जाएगी । मुझको राज माता बनना है । मंथरा ने भी उसको यही बताया था की तू ठीक सोचती है । अब तो कह दी बात उसने दशरथ से ।

राम को घर से क्यों निकल जाये भाई, राजतिलक दे दिया भरत को, चलो ठीक है, पर घर से राम को क्यों निकाला जाये ? इसलिए निकल जाये, क्योंकि भरत अभी innocent है, राज गद्दी पर बैठेगा, राम बहुत smart है । हो सकता है, राम छीन ले भरत से राज गद्दी ।  ये Presume कर रही है कैकई । यही माया है, ये presumption. माया कुछ भी नहीं इस संसार के अन्दर । वो Presume कर रही है की राम छीन लेगा मेरे बेटे से राज गद्दी । उसने कहा, राम को घर से निकालो और minimum  १४ Years के लिए निकालो । तब तक १४ years  में मेरा लड़का complete होशियार हो जायेगा । दशरथ को मानना पड़ा, बेचारे को । क्यों मानना पड़ा ? अब ये सोचिये ।  था तो राजा, अगर नहीं मानता तो कैकई क्या कर सकती थी उसका ? कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी, वो तो राजा था । But दशरथ को मानना ही पड़ा, क्यों ? क्योंकि, दशरथ के भी भ्रम रहा । उसको भ्रम रहा, कि कैकई हमारा wife है । कहाँ वाइफ है ? अगर wife होती तो दशरथ के बारे में सोचती । Wife का काम है, की family के बारे में सोचे पर वो तो family  के बारे में सोचती ही नहीं । फिर भी दशरथ भ्रम पाले है की हमारी wife  है, हमारी family है । Accept कर लिया । जिस टाइम Morning में भगवान् राम का राजतिलक होना रहा, दशरथ भगवान् राम को बताया कि राम, No, राजतिलक तुम्हारा नहीं होगा अपितु भरत का किया जायेगा और तुमको वन में जाना पड़ेगा । निकलो घर से । आप सोचिये, किसी आदमी को, आपको ही कोई बताये कि ये job आपको मिली और इतनी भारी रकम मिलेगी इस job  में, कल से join करना । और जब आप join करने जाओ तो आपका Boss बताये कि No, ये job  आपके लिये नहीं हैं, किसी दुसरे को दे दी गयी है । और बताये, कि go away और निकाल भी दे office से । कैसा feel होगा आपको ? आप सोचिए कि राम के साथ ऐसा हुआ । राम ने तनिक भी दुःख नहीं माना । राम वन के लिए चलने लगे जब राम वन केलिए चलने लगे तो सीता ने बोल की हम भी वन जायेंगे ।

जीव बिन देह, मीन बिन बारी – जैसे मछली बिना पानी के नहीं रह सकती, ये शरीर जैसे जीव के बिना नहीं रह सकता, ऐसे ही हम भी जिन्दा नहीं रह सकते आप के बिना । वो भी  राम के साथ चल दी । लक्ष्मण, step brother  रहा, सुमित्रा का बेटा, वो भी कहा कि हम भी चलेंगे । तीनों वन के लिए चले गए ।

अब राम तो वन चला गया, पीछे से आया भरत । इधर भरत के आने से पहले राजा दशरथ राम के वियोग में प्राण त्याग दिए । अब जिसके भीतर से राम निकल जाए, वो तो मुर्दा हो ही जाना है । दशरथ भी मुर्दा हो गया, क्योंकि राम निकल गया । ये जीव, ये प्राणी, भीतर जो बैठा है, वोही राम है । दशरथ का निकल गया । दशरथ, दशरथ का literal meaning जानते हैं ? दश माने Ten, दस इन्द्रियां जिसमें है, वो दशरथ है । दस इन्द्रियां, पांच ज्ञानेन्द्रियाँ कहलाती हैं, ५ senses जिनको बोलते हैं । आँख, नाक कान, जीभ और त्वचा, ये पांच senses हैं, जिनके through हम knowledge gain करते हैं । या तो हम आँख से देख कर knowledge gain करते हैं, या कान से सुन कर knowledge gain करते हैं, या smell करके knowledge gain करते हैं कि कौन सा फूल है ये, या किस चीज का smell  है या जीभ से चाख कर knowledge gain करते हैं कि ये नमक है या चीनी है या फिर skin से touch करके पता चल जायेगा कि ठंडा है कि गरम है । ये 5 senses हैं, ये पांच ज्ञानेन्द्रियाँ कहलाती है । पांच ही कर्मेन्द्रियाँ है । हाथ जिनसे हम काम करते हैं, पैर, मुंह, जिससे भोजन करते हैं । गुदा जिस से stool pass करते हैं और उपस्थ जिस से urine pass करते हैं । पांच कर्मेन्द्रियाँ, पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, इन दस इन्द्रियों वाला दशरथ ये शरीर है । ये बॉडी दशरथ है । इस body में से जब राम निकल जाए तो ये दशरथ कैसे जिन्दा रहे ? सोचिये, ये रामायण रोज हमारे भीतर होता है , everyday होता है ।  ये कोई  पुराना story नहीं है । आज भी हो रहा है । आज भी वो सब हो रहा है, जो कैकई ने किया था । क्या आज लोग इस तरह नहीं सोचते हैं, कि हमारा काम बने और दूसरे का बिगड़ जाए ? दूसरे का काम ख़राब करके भी अपना बनाओ । आज भी सोचते हैं । वो रामायण तो रोज होती है, everyday होती है, always होती है । तब भी होती थी, आज भी होती है । पर हम क्या करते हैं ? सोचते नहीं दिमाग से । ये रामायण आज भी हो रहा है । रामायण पढने का meaning है की उसे पढो और समझो की आगे क्या होने वाला है । result क्या होगा, रामायण में result हम देख चुके हैं । राम तो चला गया वन में । अब दशरथ भी मर गया । भरत लौट कर आया, शत्रुघ्न लौट कर आया नाना के घर से ।

देखा कि महल में सब कोई बड़ा चुप, कोई कुछ बोलता ही नहीं । पुछा, कहाँ है पिताजी ? दशरथ कहाँ है ? सबने बताया कि दशरथ तो स्वर्ग सिधार गए । बड़ा धक्का लगा भरत को । फिर पुछा कि राम कहाँ हैं ? लक्ष्मण कहाँ है ? सीता कहाँ है ? पता लगा की वो तो वन में चला गया । तब दूसरा धक्का लगा । आप जिसको प्रेम करते हैं, कभी नहीं चाहते कि वो दूर रहे आपसे । भरत प्रेम करते थे राम को । गुस्सा में भर गया, जब पता किया काहे गया राम वन में और पता चला कि  उसकी मां ने निकाला उसे घर से । माँ  के ऊपर बिगड़ा । बोला कि जिस time तुमने वरदान माँगा उसी समय तुम्हारे मुंह में कीड़ा क्यों नहीं पड़ गया और जब शत्रुघ्न को पता चला कि ये मंथरा अक्ल दी है इसको तो मंथरा के कूबड़ में लात मारा शत्रुघ्न ने । आप सोचिये कि लड़कों के लिए कितना कितना काम करे और लड़का refuge कर दे, हमें नहीं चाहिए । आप तो दुनिया का दौलत इकठ्ठा करो, दुनिया का चीज इकठ्ठा करो, हम लडको के लिए खाना बनाये सुन्दर सा और आपने बड़ा tasty खाना बनाया और लड़का कि हमें नहीं खाना, हम तो pizza खा कर आये हैं । अब तुम्हारा सब मेहनत बेकार । ये रोज रामायण होती है, वही कैकई के साथ हुआ । कैकई ने बड़ी कोशिश करके, राजा दशरथ को मना करके राम को वनवास और भरत के लिए राजगद्दी मांगी लेकिन बेटा तो तैयार ही नहीं राजा  बनने के लिए । उसने कहा, मैं नहीं बैठुंगा राजगद्दी पर । ये तुमने बड़ा बुरा किया है । आज कल का लडका बताता है, क्यों तुमने आलू की सब्जी बनायी, हम नहीं खा रहे । हर घर में झगडा होता है, इस तरह का । मना कर दिया भरत ने, क्यों तुम राजतिलक माँगा और कैकई बोलती है, कि हमने तो इतनी मुश्किल से राजतिलक माँगा तुम्हारे लिए । हम तो सबका बुरा बना तुम्हारे लिए और तुम accept नहीं करता । भरत बोला, नहीं, मैं accept नहीं करता । भरत बोला कि हम जायेंगे वन में और अपने भाई राम कि चिरौरी करी । अपना भाई राम को मना करके वापिस ले कर के आई । ये राजसिंहासन राम का है, वही capable है, हम इस पर बैठने लायक नहीं है । देखिये भरत की feelings. इस दुनिया में सब तरह के लोग हैं । भरत भी है, इस दुनिया में, इस दुनिया में कैकई भी है । इस दुनिया में दशरथ तो सब है, सबका जीव निकलता है, सबके प्राण निकलते हैं । सबका राम निकलते ही मर जाते हैं ।

भरत चल दिया वन के लिए । भरत चला, गुरु वसिष्ठ ने कहा, हम भी चलेंगे । वामदेव, जो उनका पूजा कराने वाला रहा, जो उनका पुरोहित रहा, वो बोल हम भी साथ चलेंगे । तीनो माताएं बोली कि हम भी चलेंगे । अब तो कैकई को भी पछतावा होने लगा, वो भी बोली कि हम भी चली, हम भी मना कर लायी राम को । तीनों मातायें चल दी । मंत्री सुमंत बोल हम भी चलेंगे । हम छोड़ कर आया था राम को वन में, अब हम भी चलेंगे राम को मनाने के लिए । सुमंत भी चल दिया । Army बोली, कि हम भी सब चलेंगे राम को मनाने के लिए । पूरा सेना भरत के साथ चल पड़ी । Town में, अयोध्या में जब पता चला, तो public बोली कि हम भी चलेंगे राम को मनाने के लिए । सब कोई राम को मनाने के लिए चल दिए।

जब अयोध्या के बाहर पहुंचा भरत, तब राम का एक friend रहा, गुह (निषादराज) । आप निषादराज जानते होंगे उसका नाम, गुह नहीं जानते होंगे । उसका real नाम था गुह । अयोध्या state के बाद में जो next state रहा, वो रहा श्रुङ्ग्वेदपुर, वहां का राजा रहा गुह । वो राम का बचपन का friend था । जब जंगल में राम पंहुचा था, तो वो ही welcome किया था आके । उसको पता चला कि भरत आ रहा है । उधर धूल उड़ता है, जरूर कोई सेना आती है । सोचने लगा कि ये जो army आती, ये कहीं हमारे ऊपर attack  नहीं कर दे । लोगों को बताया, अपने गुप्तचरों को बताया, अपने CID को बताया कि जाओ, जाकर देखो, कौन आ रहा है ? लौट कर के लोगों ने बताया कि भरत जी सेना ले करके आ रहे हैं ।

अब वो सोचता, गुह, कि भरत हम पर तो attack नहीं करने आ रहा पर वो हमसे क्यों लडेगा । पहले तो सोचता था, कि जो आ रहा है, सेना ले कर वो आक्रमण करने आ रहा है, अब उसका mind change हो गया । अब सोच रहा है, कि ये भरत सेना लेकर वन में जा रहा है वहां जा कर राम को मार देगा ताकि राज अकंटक हो जाए, निष्कंटक हो जाये । फिर हम राज करेंगे और 1 4  साल के बाद राम ही नहीं पायेगा क्योंकि राम तो होगा ही नहीं । बस, गुह अपने आदमियों को order कर दिया कि जाओ गंगा नदी के पास जा कर खड़े हो जाओ, इस भरत को गंगा पार नहीं करने देना है और भरत के साथ लड़ाई लड़नी है । what is this ? क्यों लड़ाई लड़नी है ? This is assumption. वो मान लिया कि ये जो सेना आ रही है, ये हम पर attack करने आ रही है, जब तक नहीं पता था, कि किसका सेना है और जब पता लग गया कि भरत का सेना है, वन में जा रहा है, अब assumption करे कि राम को मारने के लिए जा रहा है । This assumption is माया । ये भरमाती है, ये भ्रम में डालती है । ये चक्कर में डाल देती है । गुह ने अपनी army को alert कर दिया । सारी army alert हो गयी । गुह की army में एक बहुत senior आदमी था, वो राजा को बताया, कि राजा अभी हमारा जो right hand है, ये फड़कता है और right hand जब फड़कता है तब कुछ शुभ समाचार मिलता है, कोई खराब चीज नहीं होती । तुम सोचते हो कि ये भरत राम को मारने जाता है, हमको नहीं लगता । पहले भरत का intention जानो । तब army को alert करो । intention कैसे जानो ? Wait, इंतज़ार करो । जब भरत और आगे आ जाए, सेना और आगे आ जाए, जब चेहरा दिखाई देने लगे तो चेहरे से उसका intention भी पता लग जायेगा । Wait किये, थोड़ी देर में जब भरत और सारी सेना आगे आयी, नजदीक आयी तब गुह देखा कि आगे आगे तो वसिष्ठ मुनि चल रहे हैं सेना के, आगे आगे तो वामदेव जी चल रहे हैं सेना के । वो जो senior बताया था, कि wait करो, वो बताया कि देखो, सेना के आगे तो वसिष्ठ मुनि चलते हें, वामदेव चल रहे हैं । अगर भरत राम को मारने जाते तो फिर वसिष्ठ मुनि का कोई काम नहीं था, वो क्यों साथ में जाता । वामदेव क्यों साथ में आता । Definitely तुमने wrong assumption किया, तुम definitely गलत सोचा है । अगर तुम जल्दी करते, हम लोग करते क्या हैं ? कोई भी incident होता है, कोई भी बात होती है, Patience नहीं हमारे पास कि उसके Truth को जानें । Reality को उसकी को जाने । Assumption कर लेते हैं और फिर इन assumption के according act करते हैं, फिर झगडा होता है । 80% husband wife के झगडे इसी वजह से होते हैं । एक दूसरे के बारे में assumption कर लेते हैं । Truth कोई नहीं जानता किसी का । मान लेते हैं कि ये ऐसा सोचता है हमारे बारे में । जरूर इसके मन में ऐसा है । ये Assumption माया है । ये भरमाती है आपको । माया कुछ और नहीं है ।

अगर वो senior आदमी गुह को नहीं बताता, कि wait, patience रखो, देखो कि भरत का intention क्या है ? पहले Truth को जानो तब Army को alert करना । अगर वो ऐसा नहीं करता तो क्या होता ? भरत भी राम का भक्त है, गुह भी राम का भक्त है और दोनों राम के भक्त आपस में लड़ते । क्या होता ? दोनों तरफ से ढेर जन मर जाता । कितना अनर्थ होता । ये माया अनर्थ कराती है और ये Assumption, ये Presumption  यही माया है । जब देखा, वसिष्ठ गुरु साथ में है तो गुह मिलने के लिए भरत के पास पहुँच गया । उसके पास जाकर हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और बोल कि इतना बड़ा Army लेकर वन में क्यों जाता है ? भरत ने फिर बताया, कि हम भगवान् राम की चिरौरी करने जाता, भगवान् राम को मनाने के लिए जाता । गुह बताया, की हम भी चली आप के साथ । भगवान् का भक्त था, बोले तुम भी चलो, लेकिन अगर भगवान् का भक्त भी Assumption  करेगा तो वो भी माया में फंसेगा और उसकी सारी भक्ति ख़त्म हो जाएगी । खलास । फिर भक्ति नहीं रही । वो भी चल दिया । अब धीरे धीरे आगे चलता चला जा रहा, प्रयागराज पर पहुँच गया भरत, अपनी Army के साथ में । तब इंद्र देवता मन में सोचने लगा, वो अपने गुरु के पास गया । हाँ, गुह की बात जरूर ध्यान में रखिये । वो जो senior गुह को बताया कि wait, please. पहले सोचो, react करने से पहले । गुह को बताया तभी तो वो लड़ाई बच गयी, नहीं तो वो लड़ाई हो जाती । जो उसको ये ज्ञान दिया, गुह को, वही गुरु है । जो आपको बताये कि Patience रखो, वही गुरु है । जो आपको बताये कि Assumption नहीं करो, Assume नहीं करो, वो गुरु है । जो आपको बताये कि जल्दी नहीं करो, जल्दी React नहीं करो, बिना सोचे कोई Reaction नहीं करो, वही गुरु है । क्योंकि

बिना बिचारे यदि काम होगा, कभी ना अच्छा परिणाम होगा ।

बिना सोचे यदि कोई काम करेंगे तो result कभी अच्छा नहीं होगा । वही गुरु है । गुरु के लिए कोई जरूरी नहीं कि पीले ही कपडे पहने, गुरु के लिए जरूरी नहीं कि वो बड़े बड़े बाल रखे, सन्यासी होए, नंगा रहता होए । ये कोई चीज जरूरी नहीं है, वही गुरु है जो आपको right चीज बताये । वही ज्ञानी  है जो right चीज को जानता है । ये Assumption wrong है, यही माया है । गुरु का काम है कि माया से  बचाये , अब भरत पहुँच गया, प्रयागराज में, इंद्र को चिंता हुआ । इंद्र पहुंचा अपने गुरु के पास । देखिये चेला कैसे कैसे होयें । गुरु का misuse करना मांगे । बहुत से चेला गुरु बनावे, गुरुमुख हो जाए, और फिर गुरु से पूछे, कि गुरु कोई ऐसा मंत्र बताओ की जल्दी से money आवे । ढेर money बने । बैंक बैलेंस बढे हमारा । अरे भाई ! वो गुरु है, आपका subordinate नहीं है जो कि आप उसको बताओ कि हमारा काम बनाओ । ढेर जन गुरु को bribe  देना मांगे । इतना दक्षिणा दे गुरु आपको, कोई ऐसा मंत्र बताओ । ढेर पैसा खर्च करते हैं, वो देते हैं और लोग लेते हैं । ऐसे लोगो को गुरु नहीं मिले । कभी ऐसे लोगों को गुरु नहीं मिले, ऐसे लोगों को गुरु की जगह मिले, गुरु घंटाल । पैसा ले कर चला जाए । तब वह इंद्र पहुंचा अपने गुरु के पास, बृहस्पति के पास । जा के बताया, कि  गुरु जी कुछ ऐसा करो कि ये भरत और राम मिल नहीं पायें किसी तरह से । इनका मिलन नहीं हो पाए, भरत मिलाप नहीं हो पाए । इंद्र पहुंचा भागा भागा, अपने गुरु के पास । देखो, गुरु के पास जाए, और ऐसी खराब चीज बताये, की ये खराब काम करो, खुद तो खराब काम करे । गुरु को भी बताये कि  तुम भी खराब काम करो, रोको, इनको मिलने नहीं दो भगवान् राम को और भरत को । चेला भी ऐसे ही होते हैं, बहुत से । सोचो गुरु कैसा होना चाहिए ?

एक गुरु और चेला रहा, नदी के किनारे बैठा रहा । गुरु उपदेश देता रहा चेला को, बताया कि  माया में नहीं फंसो । बताया कि  लालच नहीं करो । गुरु बता रहा था, लालच नहीं करो, माया में नहीं फंसो । कोई भी चीज को अच्छे से सोचो । चेला, बात सब सुन रहा था गुरु की और नदी की ओर ताकता रहा । उसी time, वो नदी को देख रहा था, गुरु की तरफ नहीं देख रहा था । गुरु बताये, सुन रहा है, बोला हाँ आप ही की तरफ कान है । कान आपकी तरफ है बस आंखें दूसरी तरफ देख रही है । कान से सुनी, आँख से थोड़े ही सुनी, तो आँख से तो हम नदी की तरफ देखता है । नदी में चेला देखा कि  एक कम्बल बहता हुआ जा रहा है । चेला बताया कि गुरु जी, आप permission दें तो हम नदी में कूद जाएँ और कम्बल को ले आयें । गुरु पुछा, कि क्या करोगे कम्बल का, बोले गुरूजी रात को ठंडा लगी बहुत ज्यास्ती, कम्बल को ले आई, सुख देई और रात को ओढ़ के सोई । गुरु बताया कि अरे भाई मैंने अभी तुमको बताया, preach किया कि  लालच नहीं करो, लोभ नहीं करो, माया में नहीं फंसो । चेला बोल कि गुरु तुम बात सब बिलकुल right बताया but हम कोई लालच नहीं करता । आप तो ज्ञानी हैं, आपको ठंडा नहीं लगे पर हमें तो ठंडा लगे रात को, कम्बल चाही । Argument हुआ, गुरु देखा कि ये नहीं सुधरेगा । गुरु बताया जाओ ले आओ । वो चेला नदी में कूद गया । कूद गया, अब लौटा नहीं चेला । गुरु ताकता रहा और जब चेला और कम्बल दोनों गुरु के सामने आ गया तब गुरु आवाज लगाया कि  अरे चेला क्या हुआ ? कम्बल ले कर नहीं आया तू ? चेला बतावे गुरु, पहले हम कम्बल पकड़  लिया अच्छे से but अब कम्बल हमको पकडे है, कम्बल नहीं छोड़े है हमको । गुरु पुछा, कौन चीज हुआ ? चेला बताया कि  गुरु ये कम्बल नहीं है, ये तो भालू रहा, पानी में बहता जा रहा था । हम कम्बल समझ के इसको पकड़ा और अब भालू हमको पकड़ लिए ।

सोचो, ये Assumption, वो मान लिया कि ये कम्बल जाता है । गुरु बतावे कि लालच नहीं करो भाई । काहे मान लिया ? काहे Assumption किया ? Assumption always लालच में ले जाई, अपने स्वार्थ में आदमी करता । इसलिए गुरु बतावे की लालच नहीं करो । माया कौन चीज है ? This Assumption is माया । फँस गया । माया उसको नहीं पकड़ी है, वो माया को पकड़ा था पहले । वो उस भालू को पकड़ने गया था, कम्बल समझ के । ये भ्रम होवे है, यही माया है ।

वो इंद्र अपने गुरु के पास जा के बोला कि ये राम और भरत मिल नहीं जाए । इनका मिलाप नहीं होना चाहिए । गुरु हंसा । गुरु कभी गुस्सा नहीं करता, ये ख्याल रखना । कितना भी खराब, बदमाश चेला होए, गुरु गुस्सा नहीं करे । जो Real गुरु होए, वो गुस्सा नहीं करे । गुरु हंसा, ये सब कथा रामायण में लिखा हुआ है, जो हम सुना रहा है । गुरु बृहस्पति हंसा और हंस के बोला, की काहे चाहता तुम ऐसा ? काहे तुम चाहो चाहो कि भरत और राम मिले नहीं । एक अच्छा काम होता तुम उसे रोकना चाहता, उसमें विघ्न डालना चाहता, काहे ? स्वार्थी लोग दूसरों के अच्छे काम को भी बिगाड देते हैं । राम को राजगद्दी मिल रही थी, अपने स्वार्थ में कैकई ने बिगाड़ दिया । भरत और राम मिलने जा रहे हैं और इंद्र उसे बिगाड़ने मांगे । काहे ? इंद्र का कौन स्वार्थ रहा ? इंद्र का स्वार्थ रहा, इंद्र बड़ा सुखी था, राम को वनवास मिला जब । सोचा था, कि राम को वनवास मिला, अब राम वन में जाई और राक्षसों को मारी । फिकर ये लगा इंद्र के, कि अगर ये भरत राम से मिल गया और राम को मना लिया इसने । चिरौरी कर लिया और राम मान गया और महल लौट गया तब फिर राक्षस नहीं मरी, हमारा काम नहीं बनी । इसलिए इंद्र सोचे की ये दोनों नहीं मिल जाए । गुरु से जाके बतावे कि इन को नहीं मिलने देना है कैसे भी । गुरु बताया, अरे मुर्ख, काहे तू पहले presume करता कि ये मिल जाये, राम लौट जाए और तेरा काम बिगड़ जाए । और presume करके फिर फिकर करता, चिंता करता । यही माया है । जो हुआ  नहीं, वो सोच सोच कर दुखी हैं और चिंता में फंसे हैं । उर्दू में एक Phrase है

काजी जी काजी जी क्यों दुबले, सहर के अन्देसे से,

काजी जानो, सुबह मस्जिद के ऊपर से जो अल्लाह हो अकबर चिल्लावे । वो दुबला होने लगा, पतला होने लगा । एक आदमी पुछा की काहे पतला हुआ जाता है ? काहे दुबला होता है ? तो बताया कि  सहर के अन्देसे से । बताया कि इसलिए पतला हुआ जाए, दुबला हुआ जाए हम क्योंकि रात भर सो नहीं पावे । रात भर हम ये सोचता रहे की सवेरा होई और हमें आवाज लगाने जाना पड़ी । अरे ! सवेरा जब होई तब होई अभी तो सो भाई । लेकिन आदमी की problem ये है, कि  जो हुआ नहीं, उसे presume करता और presume करके worry करता, चिंता करता ।  This is माया । इस माया में आदमी फंसा है । इसलिए कबीर कहता, माया दीपक नर पतंग, भ्रम भ्रम इवे पड़ंत । घूम घूम करके इस माया में फँस रहा है आदमी । माया किसी को नहीं पकड़ी है । आदमी माया को पकडे है भाई । आप Assumption करना छोड़ दीजिये, आप presumption करना छोड़ दीजिये, आप भ्रम पालना छोड़ दीजिये । illusion करना छोड़ दीजिये । truth को जानो । truth को जानने के लिए Patience चाहिए । But patience नहीं है आज आदमी में, उसे हर चीज instant  चाहिए । हर चीज आदमी को तुरंत चाहिए, wait करना नहीं मांगे । तब ज्ञान कहाँ से मिले ? शिष्य में quality होना चाहिए कि उसमें patience होए । जिसमें patience नहीं, वो ज्ञान नहीं ले सके । गुरु का quality होना चाहिए, कि उसके पास knowledge हो । कपडा अच्छा पहना हो या नहीं पहना हो । उसका कोई meaning नहीं है । ये है गुरु और शिष्य ।

गुरु बृहस्पति ने फटकार दिया, बताया, कि मरने का काम नहीं करो । जोन चीज तुम सोचता, अगर तुम करता, या हम करता तो तुम नष्ट हो जाई । हम तो बच जाई अपने ज्ञान से, पर तुम नहीं बच सके । तब इंद्र चुप हुआ । अब भरत और आगे पहुंचा, चित्रकूट में, भगवान् राम चित्रकूट में रुका  था । चित्रकूट से ढाई कोस पहले रात होने लगा । ढाई कोस, दो किलोमीटर का एक कोस होता है । पांच किलोमीटर का ढाई कोस होता है । यानी एक मील का । तो जब पांच किलोमीटर दूर रह गया चित्रकूट, तो भरत अपनी army को लेकर rest करने लगा, बोला कि आज रात को यहीं रुकते हैं हम । रात को मिलना ठीक नहीं है । Morning में जाके, सुबह में जाके मिलेंगे राम से । रात को सब वहीँ विश्राम किये । जब morning होने लगा तो भोर में सीता माता सपना देखने लगी । सीता माता सपना देखी, कि  भरत army लेकर वन में आता रहा । सीता माता सपने में देखी कि तीनों माता भी साथ में है । कौशल्या, सुमित्रा और कैकई but तीनो में से एक ने भी सिंगार नहीं किये । बड़ा मैला सा सफेद साड़ी पहने है । सीता उठते ही राम को अपना सपना सुनाई । राम सपने को सुनते ही लक्ष्मण को कहने लगे सीता जो सपना सुनाया वो भोर का सपना है और भोर का सपना जरूर सच्चा होई । जानो आज जरूर कोई बुरा खबर मिली । ये सीता तीनों माताओं को बिना श्रृंगार के देखी है । ये सीता सबको सफेद साडी में देखी है । आज जरूर कोई खराब समाचार मिले । थोड़ी देर में भोर हो गया, तो वहां के जो natives रहे, आदिवासी लोग रहे उस area के । आपके फिजी में भी होते होंगे, जो natives होते हैं, उनमें कबीले होते हैं अलग अलग, अगर आपको मालूम हो तो । अलग अलग कोल होते हैं आदिवासियों के ऐसे ही India में अलग अलग कोल होते थे आदिवासियों के । एक का नाम कोल, एक का नाम भील, एक नाम किरात, इस तरह से कोल होते थे । तो कोल, भील और किरात भाग भाग कर के राम के पास आये सुबह होते ही और बताया कि कोई राजा आया है, बड़ा भारी army ले के । राम बताया कि  definitely भरत आ गया है । सीता माता सपना में देखी है । भरत आ गया है, लक्ष्मण से कहा कि  भरत सेना ले कर के आ गया है but हम सोचता है कि सेना ले के काहे आवे है ? तब तक कुछ और लोग आ कर के बताया की बड़ा भारी army है, हाथी भी है, घोडा भी है, बहुत चीज है उसके साथ । लक्ष्मण जी राम भगवान् से कहने लगे, कि आप तो सबको अपने जैसा समझते हो । आप नहीं जानते कि भरत के मन में कौन चीज है ? अरे ! भरत वन में आ रहा है और army ले कर आ रहा है, इसका meaning है , अब देखिये फिर Assumption, इसका meaning है आपको वन में अकेला जान कर मारना चाहे । सोचता है, राम के मारते ही, तब चौदह साल बाद राज वापिस नहीं लौटाना पड़े ।

भगवान् राम बताया कि ये नहीं हो सके । अरे तुम भरत को जानता नहीं है ? बचपन से भरत के साथ रहा है, हम भी बचपन से भरत के साथ रहा है, कितना प्रेम करता रहा भरत हम को । भरत ऐसा नहीं सोच सके । लक्ष्मण तो example दे रहा है । कहने लगा, कि विष की बेल पर कभी अमृत का फल नहीं लगता । अरे, जिसकी माँ इतना खराब काम करी उसके लड़के से आप कैसे उम्मीद करो कि अच्छा काम करी, वो भी खराब काम ही करी । इसीलिए यहाँ आता है army ले कर के, वरना वन में army लेकर के आने का कौन काम था ? देखिये कैसे कैसे Assumption करते हैं हम, कैसे कैसे Argument देते हैं, अपने assumption को राईट बताने के लिए । लक्ष्मण कहने लगा,

सत्ता पाये काहे मद नाही,

रामायण में लिखा है, सत्ता मिल जाने पर किसको घमंड नहीं हो जाता है । अरे भरत को राज सिंहासन मिल गया है, राज सिंहासन मिलने पर तो सबको घमंड हो जाता है । नहुष जैसा तपस्वी राजा,उसको जब इंद्र का सिंहासन मिला रहा तो इतना घमंड हो गया कि ऋषि मुनियों से बताने लगा कि हमारा पालकी उठाओ । कितना घमंड हो जाता है सत्ता पा कर के । Power जब मिल जाती है, तो आदमी को घमंड हो जाता है, भरत को भी घमंड हो गया है । आप तो समझता है कि सब आप जैसा अच्छा लोग हैं । दुनिया अच्छा नहीं है । आदमी assumption करता है । लक्ष्मण भी assumption करने लगा । भगवान् राम बताये, कि भरत ऐसा नहीं कर सके है । भगवान् राम कहते है कि

भरतहि होई न राज मद, बिधि हरि हर पद पाये । कबहूँ न कांजी सी करी, क्षीर सिन्धु बिन साये ।

भगवान् राम ने कहा, भरतहि होई न राज मद – भारत को राज्य का, Power का घमंड नहीं हो सकता । अरे, ये राज सिंहासन तो बहुत छोटा सा चीज है, बिधि हरि हर पद पाये – ब्रह्मा जी का पद भी दे दिया जाय, भारत को, विष्णु भगवान् का सिंहासन दे दिया जाये, भारत को, शंकर भगवान् का सिंहासन दे दिया जाए भारत को तब भी भरत को घमंड नहीं हो सके है । कबहूँ न कांजी सी करी, क्षीर सिन्धु बिन साये – दूध का पूरा समुन्द्र, क्षीर सागर में रहे भगवान् बिष्णु । क्षीर कहते है दूध को, संस्कृत भाषा में । बताया कि क्षीर का समुन्द्र, दूध का समुन्द्र और उसमें अगर एक बूँद खटाई की गिर जाये तब क्या वो दूध फट जाई । नहीं फटी वो दूध, हाँ, अगर एक गिलास दूध होए और उसमें एक बूँद खटाई गिर जाये तो दूध जरूर फट जाये । पूरे समुन्द्र में एक बूँद खटाई कुछ नहीं बिगाड़ सके । भरत का मन तो समुन्द्र की तरह से है और ये राजसिंहासन खटाई की एक छोटी से बूँद है । ये भरत का मन ख़राब न कर सके । भरत को घमंड न हो सके ।

अब जानो, माया कौन चीज है और माया से बचना कौन चीज है ? ये जो गुह ने Assumption किया, That is माया । इंद्र के मन में जो स्वार्थ आया कि भरत मिलाप नहीं होए, That is माया । लक्ष्मण के मन में जोन बात आया, कि हमको मारने के लिए भरत आता, That is माया । यानी ये Assumption माया है । ये फंसा देती है । जब हम Assumption के according चलते, act करते हैं उसके accordingly, तब सामने से react होता है, झगडा बढ़ता चला जाता है और problems create होती चली जाती हैं । This is माया । वो सारी problems तो हम create किये हैं । अब ये Assumption होते क्या हैं ? और काहे को होते हैं ? इस पर और चर्चा करते हैं । क्यों हम माया में फंसते ? देखिये भगवान् राम माया में फंसा नहीं रहा । वो कोई Assumption नहीं किया, लक्ष्मण assumption कर रहा है । गुह ने assumption किया । भगवान् राम माया से बचा हुआ है, वो कोई assumption नहीं कर रहा है । इसलिए भगवान् राम को बताये, मायापति । वो माया का lord है, माया उसके according चली । वो माया के हिसाब से नहीं चली । वो माया में नहीं फँसी, because वो Assumption नहीं करता है  । यही भगवान् में और इंसान में difference है । यही माया है । गुरु का काम है कि आप को माया में से निकाले । यानी आपके भीतर जो presumptions हैं, assumption हैं । आपके भीतर जो illusions हैं । उनको पहले खलास करे, काटे, समाप्त करे । जब तक ये समाप्त नहीं होई, तब तक ये जो मन का, बुद्धि का बर्तन है, हांडी है, ये खाली नहीं होई । और जब ये खाली होई तब तो ज्ञान घुसे इसमें । पहले इस बुद्धि में से ये सब बेकार का बवाल निकालना पड़ेगा । गुरु का काम है पहले इसे निकाले और फिर उसमें ज्ञान डाले । दो काम करना पड़े गुरु को । शिष्य केवल गुरु से सीख कर के ज्ञान नहीं ले सके, बहुत से लोग जाए, गुरु हमें ज्ञान दो । अरे !!! ज्ञान गुरु तो दे देई, पर तुम्हारे बर्तन में, हांडी में घुसी तो नहीं वो । पहले उसको खाली तो करो भाई । वो पहले से भरा है तो कहाँ ज्ञान जाई ? उसमें तो दुनिया भर का बवाल भरा है । इतना illusion, इतना भ्रम पाल रखे हैं । गुरु का काम पहले भ्रम को ख़तम करे । पहले माया काटो । जब माया कटी, तब ज्ञान आई । जब ज्ञान आई, तब भगवान् मिली । भगवान् राम Assumption नहीं करता । ये assumption, यही माया है । हम मान लेते हैं, कि ऐसा है । हम मान लेते हैं कि वेसा है । जाने कितने भ्रम पाल लेते हैं हम ।

रोज हम बताते सूरज निकलता है, सूरज छिपता है । अरे भाई ! सूरज तो न निकलता है, न छिपता है, सूरज तो वहीँ है, जहाँ है । धरती के घूमने की वजह से हम जब सूरज के सामने आये तो हम कहते कि सूरज निकल रहा है । धरती के घूमने की वजह से हम जब सूरज के सामने से हटते, तो हम कहते कि अब सूरज छिप रहा है । सूरज तो वहीँ का वहीँ है, everytime निकला रहे, वो कभी छिपे नहीं, वो कभी निकले नहीं । कितने illusions हम पाले, कितने भ्रम हम पालें । ऐसे ही दुनिया में हम सोचते कि ये हमारा है, ये पराया है । ये अच्छा है, ये बुरा है । ये सुन्दर है, ये असुंदर  है । ये सुख है, ये दुःख है । ये सब हमारे presumption हैं, ये सब हमारे भ्रम हैं । यही माया है । Real  में कहीं सुख नहीं है, कहीं दुःख नहीं है । एक बेन्थम नाम का philosopher हुआ है । ब्रिटेन में । वो लिखा –

nature has placed two govern masters – pain and  Pleasure. which covers all we say, all we think and every efforts.

वो कहता है, कि हम जो सोचते हैं, हम जो करते हैं । जो हम बोलते हैं, सब चीज हमारी govern होती है, दो चीजों से – सुख से और दुःख से । आप लोग थक जाएँ तो मुझे बता दीजियेगा । मैं वरना 9 बजे ख़त्म करूँगा, right time. तो वो कहता है, कि सुख से और दुःख से, हमारा बोलना, हमारा सोचना, हमारा Action, इन दो चीजों से govern होते हैं, सुख से और दुःख से । हमारे वेद, ऋषि, शास्त्र बताते हैं कि सुख दुःख तो कहीं है ही नहीं । वो western thought है । हमारा thought  है, that  there is no सुख, there is no दुःख । वो कहता है, भगवान् दिया, nature दी । नो, कोई नहीं देता । अगर सुख दुःख कुछ है तो उसको भी हम create करता । कहीं सुख नहीं है, कहीं दुःख नहीं है । सोचो मेरे साथ, मेरा grand son आवे, मैं काम में लगा हूँ । लिख रहा हूँ, या book पढ़ रहा हूँ । मेरा grandson आता है, आता और मेरे कंधे पर चढ़ जाता । कभी मेरे बाल खींचता है, कभी मेरा चश्मा खींचता है, कभी मेरी मूंछे खींचता है । मैं उसको उतार के नीचे रख देता और फिर अपने काम में लग जाता । जब मेरा काम ख़तम होवे तब में अपनी wife को सुनाऊ, कि बड़ा बदमाश हो गया है, बहुत उधम करे । कंधे पर चढ़ जाए, चश्मे को कभी छोड़े नहीं । मूंछे खींचे, वो हंसती है और खुश होती है । मैं भी खुश होता हूँ । अपने लड़का को बतावे, अपनी बहू को बतावे, वो भी ख़ुशी होवे । कभी कभी तो इतना ख़ुशी होवे हम, की उस अपने grandson को बुलावे और उसको बतावे की आओ कन्धा पर चढो और कन्धा पर चढ़ाई के उसको चश्मा दिखाए ताकि वो खींचे । Demonstrate करना मांगे । कितना ख़ुशी लगे । Right. अब उसी मूंछ को, जिसको grandson खींचता था, उसीको मेरा पडोसी खींचे तब ? सोचिये जरा ।

पडोसी खींचे तो मुझे दुःख लगे, झगडा हो जाये, लाठी डंडा चल जाये, गाली निकले हम । हमारा wife भी निकाली, हमारा लडकन निकाली क्योंकि उनको बुरा लगी । अब सोचो कि मूंछ खिचने में सुख है या  दुःख है ? सोचिये ठन्डे दिमाग से । अगर मूंछ खिंचने में सुख होता तो पडोसी खींचा तो हम काहे दुखी हुआ ? और अगर मूंछ खीचने में अगर दुःख होता तो grandson खींचा तो हमें ख़ुशी काहे हुआ ? It means  सुख दुःख कहीं नहीं है । हम ये सब presume  करते हैं । ये सब हम assume करते हैं, मान लेते हैं पहले से इस चीज में सुख मिली, इस चीज में दुःख मिली । हम देखता कि हिंदुस्तान में ढेर जन Bombey में, फुटपाथ पर, कडा जमीन पर, बिना कुछ बिछाए सो जाता, हजारों, ढेरों आदमी सो जाता । आप भी कभी TV में देखा होगा या कोई वहां गया होगा तो देखा होगा India में । इतनी गहरी नींद में सोता, उस कद जमीन पे, कि morning में पुलिस वाला डंडा मार मार कर जगावे । इतनी गहरी नींद में सोता है और हम ये भी देखा कि Canada में, America में, भारी भारी खटिया के ऊपर, sleeping pill खा के भी नींद नहीं आवे । हम देखा इस चीज को । कहाँ है सुख ? बताओ मुझको । कहीं सुख नहीं है, कहीं दुःख नहीं है । ये सब हमारा presumption है, ये सब हमारा assumption है, ये सब हमारा illusion है, ये सब हमारा delusion है । यही माया है ।

माया दीपक नर पतंग, भ्रम भ्रम इवे पड़ंत । कहँ कबीर गुरु ज्ञान ते, एक आध उबरंत । ।

एक आध की ही अक्ल में ये बात आवे, जो हम बतावे आज । हाँ । यहाँ तो कही, बहुत अच्छा बताया गुरु जी और फिर घर जा के फिर दुःख मांगे, फिर सुख मांगे । फिर उसी बवाल में फँस जाए । यही Human Nature है । यही माया है । माया को हम create करें । सुख दुःख कहीं नहीं है । अब सोचो, कि ये सुख सुख फिर Feel काहे होवे । एक आदमी हमारे घर आवे, हम ज्योतिष का भी काम करे, जन्मपत्री भी बनावे । कोई आदमी आवे morning  हमारे घर । पंडित जी, बड़ा परेशान हूँ, हमारे लड़के की एक किडनी बचा लो, कोई पूजा करो कोई पाठ करो कि एकदम ठीक हो जाये, सुख मिल जाये । वो चला जाए, पूछ कर हमसे । आधा घंटा बाद दूसरा आदमी आवे । वो आके बतावे, पंडित जी, लड़के बड़ा परेशान करते हैं । कोई ऐसा उपाय बताओ कि इनसे पीछा छूट जाए । अब हम सोचे कि लड़कों के होने में सुख है या लड़कों के नहीं होने में सुख है । एक आदमी आवे, पंडित जी, पत्रा देख पर बताओ, कब हमारा शादी होई । बड़ा दुखी है । आधा घंटे बाद दूसरा आदमी आवे, पूछे पंडित जी जरा पत्रा देख कर बताओ कि हमारा Divorce कब होवे । बड़ा दुखी है wife से । सोचो कि divorce में सुख है कि शादी में सुख है ? सुख दुःख तो कहीं है ही नहीं । ये सब हमारा assumption है, ये सब हमारा presumption  है, ये सब हमारा illusion है, , ये सब हमारा delusion है । That  is  माया । कोई सुखी नहीं देखा हम इस दुनिया में, जितना आदमी देखा, सब दुखी मिला । बड़ा बड़ा धनवान आवे हमारे पास जन्मपत्री लेके, बड़ा दुखी है । बड़ा बड़ा minister India का आवे, वो भी बड़ा दुखी है । कोई इसलिए दुखी है क्योंकि उसके पास money नहीं है । कोई इसलिए दुखी है कि ढेर money है पर उसको use करने वाला कोई नहीं है । कोई इसलिए दुखी है, कि money है, उसको use करने वाले भी हैं पर use करने वाले उसका misuse कर रहे हैं । कोई इसलिए दुखी है कि बीमार है । शरीर से लाचार है । कोई कोई तो इसीलिए दुखी है कि दूसरा सुखी क्यों है । मुझे अभी तक कोई आदमी सुखी नहीं मिला दुनिया में । हाँ, बस में सुखी हूँ और सब दुखी हैं संसार में । इसीलिए कबीर ने कहा –

दुखिया सब संसार है, खावे और सोवे । 

सुखी कौन है फिर ? जो जागे । Brain रखे । सोचे । Alert  रहे । अक्ल रखे । वो सुखी है । सोचो, कि एक जानवर में और इंसान में क्या Difference  है । जानवर भी पैदा होये, इंसान भी पैदा होवे । जानवर भी खाता है, इंसान भी खाता है । जानवर भी गोबर करे, इंसान भी गोबर करे । जानवर भी बच्चे पैदा करता है, इंसान भी बच्चे पैदा करता है । जानवर भी मरता है, इंसान भी मरता है । जानवर भी भीड़ के पीछे भागे, आगे वाला जानवर जिधर जाए, पीछे वाला जानवर भी सब उधर ही जाए । कभी आपने देखा होगा भेड़ को, बकरी को, गायों को देखा होगा । आगे वाला जिधर जाए, सब उधर ही जाए । इन्सान भी यही कर रहा है । जिस मंदिर में सब से ज्यादा भीड़ जाई, उसी मंदिर में सबसे ज्यादा public जाई । जिस महात्मा के पीछे सबसे ज्यादा भीड़ जाई, ये ही सबसे बड़ा महात्मा है । Crowd के पीछे भागे । तो जानवर में और इंसान में कौन Difference  है ? भगवान् तो Difference  बनाया । वो इंसान को अक्ल दिया । But इंसान इसको Use नहीं करे । सब चीज presume कर ले, सब चीज दूसरा का copy करे, सब कोई भाड़ में जाये तो खुद भी भाड़ में चला जाये । दूसरा बताया कि यहाँ सुख है, मान लिया कि यहाँ सुख है । दुसरे ने बताया कि यहाँ दुःख है, तो मान लिया कि यहाँ दुःख है । अपनी अक्ल से तो सोचा ही नहीं । जब अपनी अक्ल से सोचेगा तो पता चलेगा कि  सुख दुःख तो कहीं है ही नहीं ।  सुख दुःख कहीं है ही नहीं लेकिन हम मानते हैं और मजे की एक और बात है, इस से भी बड़ा पागलपन, इस से भी बड़ा एक delusion और बताई इंसान का । पहली चीज तो जो है ही नहीं, उसे मानता कि  है, एक पागलपन, दूसरा पागलपन, जिस चीज को मांगता है उस में मजा नहीं पकडे और जिस चीज से बचना मांगे उस में सब से ज्यादा मजा ले । इस दुनिया में हर आदमी दुःख से बचना मांगे । हर आदमी सुख मांगता है । सब को सुख चाही, सब दुःख से बचना मांगे । बताओ कोई ऐसा है जो सुख नहीं चाहता हो या दुःख से बचना नहीं चाहे । सब चाहते हैं कि दुःख कटे, सुख आवे । लेकिन अब जरा मेरे साथ सोचिये ।

घर में अपना Spouse, अपना माई बप्पा, अपना लडकन, अपना भाई बहन, कोई friend या job में Boss कोई pinching बात बता दिया । अब कौन चीज होवे ? लडकन हमसे उल्टा सीधा बोल गया, अब वो बात पिंच करे । अब रात भर पड़ा पड़ा सोचे, काहे  हमारे ही साथ ऐसा होता, औरों के भी तो लडकन है, कोई ऐसा नहीं करे । हमारे ही लडकन हमारे साथ में ऐसा क्यों करते । पता नहीं हमारे भाग्य में कौन चीज लिखा है ? पंडित जी तो बताया रहा, की बहुत अच्छा पत्रा है  तुम्हारा । अब कोई problem नहीं है । यहाँ तो रोज problem होता है, कैसे जिंदगी  कटे ? रात भर नहीं सोई, सोच सोच कर दुखी हुई और रात भर नहीं, कई कई रात नहीं सोई । कई कई दिन तक चिंता करता रही । सोचता रही, कैसे होई ? का होई ? कभी कभी तो अकेला बैठ कर रो ले आदमी । कोई कोई तो हम देखा, कि  बोले इस जिंदगी से तो मर जाना अच्छा । ऐसे भी ढेर जने हैं और कुछ बेवकूफ तो Suicide भी कर लें । कई कई दिन तक सोच रहे हैं, दुखी हो रहे हैं । घर वाले बतावे, खाना ready है, खाना खाओ, कहता है भूख नहीं लग रही है । यानी भूख नहीं लगे दुःख में, रात रात भर नींद नहीं आवे । जोन time ये सब चीज सोच सोच कर के, कौन कौन चीज सोच कर के – कि काहे हमारे साथ ही ऐसा होता, और तो किसी के साथ नहीं होता, पता नहीं कौन चीज हमारे भाग्य में लिखा । ये सब चीज सोच सोच के जोन टाइम हम दुखी होता रहा, उस टाइम कोई फ्रेंड आकर बताये कि चलो India से पंडित आया है कथा सुन आयें या कोई फ्रेंड आके बताये कि चलो कोई बहुत अच्छा movie  लगा है चलो देख लें । तब क्या बोलते हैं फ्रेंड को ? तुम चले जाओ यार, अपना दिमाग ठीक नहीं है । नहीं जाना मांगे । काहे नहीं जाना मांगे ? अगर फ्रेंड के साथ चले जायेंगे तो Mind Divert हो जायेगा । Mind Divert हो जायेगा तो जो चीज सोच रहे थे वो सोचना बंद हो जायेगा । सोचना बंद हो जायेगा तो दुखी होना बंद हो जायेगा और दुखी होने में इतना मजा आ रहा है, कि छोड़ कर नहीं जाना मांगे ।

सोचिये, जिस दुःख से बचना चाहता है, उस दुःख में तो मजा ले रहा है । वोही spouse , वो ही लडकन, वो ही माई-बप्पा कभी कोई Pleasing बात भी बतावे । ऐसा नहीं हो सकता, की always कोई पिंचिंग बात करता रहे और कभी कोई Pleasing बात नहीं करता होए । क्योंकि हर चीज के २ पहलू होते हैं, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं । २ साइड होती हैं हर चीज की । जहाँ अच्छा कुछ होए, वहां बुरा जरूर कुछ होए, जहाँ बुरा कुछ होए वहां अच्छा जरूर कुछ होए । तो जो pinching बात बताया, वो कभी Pleasing बात भी करे । अभी सोचिये, कि उस Pleasing बात को सोच सोच के कभी ऐसा हुआ है कि रात भर नींद नहीं आये आपको । कभी ऐसा नहीं हुआ, क्यों कि pleasing बात में तो मजा ही नहीं पकडे । सुख तो अच्छा ही नहीं लगे । वो Pleasing बात हो जाये तो क्या सोचता है ? This is his Duty and this is our right. खलास । अब इसके आगे नहीं सोचे कुछ और । ये तो होना ही था, ये तो इसको करना ही था, करना चाहिए था इसको । उसको सोच सोच के ख़ुशी नहीं होए कि हमारा लडकन कितना अच्छा है, रात रात भर सोचें, रात रात भर नींद नहीं आये । उसमें मजा पकडे । सुख में मजा नहीं पकडे । पहले तो मजा नहीं आवे सुख में और कभी कभी गलती से, by the way, आदमी खुशी हो जाये तो कौन चीज बोले friend से, आज हम बड़ा खुश है, चलो party हो जाये । Party की, दारु Bear पी, Mind को Divert कर दे । ख़ुशी के बारे में सोचना नहीं मांगे । दुःख के बारे में सोचना मांगे always pinching बात को सोचना मांगे, ये दूसरा, पहला पागलपन तो ये कि really जो सुख दुःख है ही नहीं, उनको मानता कि हैं ।  दूसरा पागलपन ये  कि जिस सुख को चाहता उसमें मजा नहीं पकडे और जिस दुःख को नहीं चाहता उसमें मजा पकडे । कितना बड़ा पागलपन है । यही माया है । यही भ्रम है । ये भ्रम आदमी जो पालता, यही माया है । गुरु का काम है, इस भ्रम को काटे । गुरु का काम है कि भीतर से पहले माया को निकाले बाहर । पहले दिल को और दिमाग को साफ़ करे । इसलिए हमारे वेद बतावे, शास्त्र बतावे, संत बतावे, ऋषि बतावे, सब बतावे कि मन को शुद्ध करो । मन शुद्ध कब होई, जब उसमें जो कूड़ा भरा रहे, ये garbage भरा रहे, उल्टा सीधा जो assumption, presumption, illusion भरा रहे इनको निकाल कर बाहर करे, तब मन शुद्ध होई ।

मन शुद्ध नहीं तो कितना भी पूजा करते रहो भगवान् का कुछ नहीं होई । अगर मन शुद्ध है तो एक बार मुंह से राम बोल दो, राम सामने आके खड़ा हो जायेगा । लेकिन मन को तो शुद्ध करना मांगे ही नहीं । Argument करे, अरे ! दुनिया तो पंडित जी ऐसे ही चले आप तो ऊँचा ऊँचा ज्ञान का बातें करो । दुनिया तो ऐसे ही चले । ठीक है, अगर ऐसे ही चले तो काहे को दुखी होता है भाई । चला ऐसे ही । होता रह दुखी, फिर काहे गुरु जी के पास जाए कि हमारा संकट काटो । सोचिये इस चीज को । फिर काहे गुरु बनाओ ? गुरु का काम है कि मनुष्य के भीतर के अज्ञान को नष्ट करे । फिर उसमें ज्ञान भरे । जो Direct ज्ञान भरना चाहता है, बिना अज्ञान को नष्ट किये जानो वो गुरु नहीं है । वो knowledge-full person नहीं है । वो नहीं जनता कि ज्ञान कैसे दिया जाये । एक बात last में मैं बताता हूँ । जैसे गुरु दो तरह के हैं, कुछ गुरु तो real में होते हैं । जो real गुरु होई वो आप जैसा होई, ख्याल करो हमेशा । आप से extra नहीं होई । जो आपसे extra है, जो नंगा घूम रहा है या पीला कपडा पहन कर घूम रहा है या बाल लम्बा कर के घूम रहा है , तिलक छापे लगा कर घूम रहा है, आप से different lifestyle में रह रहा है । वो गुरु नहीं हो सकता । ख्याल रखो इस बात का । जो real गुरु होई वो बिलकुल normal रही । आप में से ही होगा । आप में भी बहुत ज्ञानी कहीं न कभी मिल जायेंगे । इस संसार में अज्ञानी कोई नहीं है । एक कुत्ते को भी ज्ञान होता है अपने मालिक को पहचानता है । जिसको हम बोलते हैं कि ये आदमी तनिक भी पढ़ा लिखा नहीं है, Signature नहीं करना चाहे, कुछ न कुछ तो जरूर जानता है । अज्ञानी तो कोई नहीं है । इसलिए संस्कृत language में अज्ञान के लिए कोई शब्द नहीं है अलग से । ज्ञान में अ लगा कर काम चलाते हैं । अज्ञान में भी ज्ञान छिपा हुआ है । अज्ञानी कोई है ही नहीं इस संसार में, तो गुरु तो आपके भीतर ही मौजूद है । आप में से ही निकलेगा ।  सन्यासी को अगर गुरु बनाओ, गृहस्थ के बारे में जाने नही तो कौन चीज बताई आपको ?    गुरु का meaning ये है कि गृहस्थ के बारे में भी जाने, सन्यास के बारे में भी जाने । गुरु का meaning ये है कि  माया को भी जाने और भगवान् को भी जाने । गुरु का meaning ये है कि बुराई को भी जाने, अच्छाई को भी जाने । That is गुरु । गुरु वो है जो दुनियादारी को भी जानता है और दुनियादारी के बाहर की चीजें भी जानता है । वो गुरु है । जो केवल अध्यात्म, अध्यात्म, अध्यात्म, भगवान्, भगवान्, भगवान् की बात करे वो गुरु नहीं हो सकता है । क्यों ? क्योंकि वो Incomplete है । Complete का मतलब ये है कि हर चीज का दो side होवे, दोनों को जाने । इस लोक को भी जो सुधारता हो, उस लोक को भी जो सुधारता हो, That is गुरु । जब गुरु से ज्ञान मिले माया कट जाये तो इस लोक में भी सुख मिले । तब Effluence मिले, जिस Effluence के पीछे लोग भागते । वो Effluence तब मिली । इस जन्म में भी सुख मिली, अगला जनम में भी सुख मिली । हर जन्म में सुख मिली । मुक्ति हो जाई, मोक्ष भी हो जाई, फिर जन्म नहीं लेना पड़े । गुरु वो है जो दोनों को जानता है । जो केवल एक बात को जानता है, भगवान् को मानो, भगवान् की पूजा करते रहो, That is not गुरु । उसके पास ज्ञान नहीं है ।

आप अगर एक Coin हाथ में लो तो ऐसा हो ही नहीं सकता की एक ही side आये उसका हाथ में, दूसरा side हाथ में नहीं आये । दोनों साइड हाथ में लेनी पड़ेंगी तब कम्पलीट Coin आपके पास आएगा । जितना जरूरी अध्यात्म है, उतना ही जरूरी भौतिकता भी है । जितना जरूरी जीव है, उतना ही जरूरी ये शरीर भी है । दोनों चीज चाही, इसलिए तुलसीदास जी रामायण में लिखे –

गिरा अर्थ जल बीच सम, कहियत भिन्न न भिन्न ।

कहने के लिए शब्द और अर्थ, Words और Meaning, कहने के लिए दोनों अलग अलग चीज हैं । शब्द अलग होता है और हिंदी में उसका अर्थ अलग होता है । कहने के लिए दोनों अलग अलग हैं लेकिन Meaning को Words से अलग नहीं कर सकते । जहाँ Meaning होए वहां words होए जहाँ words होए वहां मीनिंग भी होए । अलग नहीं कर सको । इस शरीर से आत्मा को अलग नहीं कर सको, इस आत्मा को शरीर से अलग नहीं कर सको । अगर आत्मज्ञान पाना है तो इस शरीर को भी जानो और आत्मा को भी जानो तब knowledge मिली । गुरु वो है जो इस संसार को भी जानता है और इस संसार से बाहर की चीजों को भी जानता है । गुरु वो है जो शरीर को भी जानता है और भीतर आत्मा को भी जानता है । जो बताता कि वो आत्मा के बारे में जानता पर शरीर के बारे कुछ भी नहीं जानता, जानो कि वो गुरु नहीं है, वो ज्ञानी नहीं है, वो दिखावा करता है । जो बतावे कि वो परमात्मा के बारे में जनता पर संसार के बारे में कुछ नहीं जनता, जानो कि वो ज्ञानी नहीं है । ये गुरु की पहचान है  

अब शिष्य, शिष्य तीन प्रकार का होवे है । बस ये last बात बताता हूँ । शिष्य तीन प्रकार का होवे है । कुछ लोग तो ऐसे होते दुनिया में, अपने से ज्ञान हो जाए जिनको, अपने से समझ जाते चीजों को । एक मुनि हुये हमारे देश में, दत्तात्रेय । नाम सुना होगा आपने । 24 गुरु बनाया रहा दत्तात्रेय । एक बार दत्तात्रेय मुनि, रास्ता में जाता रहा । सन्यासी आदमी, Town में आ गया । Sidewalk पर चल रहा था । देखा कि एक जगह दो रास्ता मिलते आकर । वहीँ बगल में एक लोहार का झोंपड़ी रहा । उसमे लोहार बैठा रहा और वो बाण बनाता रहा, तीर । धनुष बाण जब चले है वो वाला बाण । बना बना के ढेर सारा बाण इकठ्ठा किया रहा । वो एक बाण उठाता लोहार, फिर पत्थर पर उसे घिसे और फिर घिस घिस कर के उसे ऐसे देखे की धार पैनी हुई की नहीं । जो Right होता जावे घिस घिस कर के उसे एक तरफ रखता जावे और जो नहीं right हो, उसे फिर से घिसे । दत्तात्रेय ने कभी देखा नहीं ऐसा चीज, नहीं देखा तो एक curiosity रहा तो खड़ा होकर देखने लगा । वो अपने काम में लगा रहा, थोडा देर में वो जो Town रहा, वहां का राजा का सवारी निकला वहां से । राजा का सवारी जब निकले तो राजा के साथ हाथी, घोडा, सेना सब निकले । आगे आगे ढोल नगाड़े बाजा बजता जावे । बड़ा जोर का सवारी निकला राजा का । वो लोहार अपने काम में लगा रहा, थोडा देर में वो सवारी निकल गया वहां से । दत्तात्रेय उसको भी देखा । थोड़ी देर में जब राजा का सवारी निकल गया तो करीब बीस मिनट बाद राजा का मंत्री आया घोडा पर । वो लोहार के पास गया और लोहार से पूछा कि भाई, तुम यहाँ बैठे हो, यहाँ से राजा का सवारी गया, बता सकते हो कि वो कौन सा रास्ता पर गया है, इधर वाला पर कि उधर वाला पर । लोहार बताया कि  राजा का सवारी हमने तो नहीं देखा । यहाँ से कोई सवारी नहीं गया राजा का । दत्तात्रेय मुनि, जाके लोहार के चरण पकड़ लिया कि तू गुरु है । कौन चीज सीखा दत्तात्रेय ? दत्तात्रेय सीखा कि  अपने काम में इतना डूब जाओ कि  कुछ होश नहीं रहे । उस लोहार को पता नहीं लगा अपने काम में कि कब कब राजा का सवारी निकला, इतना घोडा, हाथी, बाजा निकला, उसको पता नहीं लगा । आज कल तो आदमी डूबना नहीं मांगे । पूजा करने बैठी, लडकन ने रेडियो चला दिया या टीवी चला दिया । हल्ला मचने लगता, हॊ; बंद करो इसको, हमको पूजा नहीं करने देता । अरे ! लडकन को बंद करावे, अपने Mind को काहे नहीं एक जगह लगावे । वो तो लगता ही नहीं । दत्तात्रेय मुनि चरण पकड़ लिया कि तू गुरु है मेरा । तो एक तो शिष्य वो होवे है जो ज्ञान अपने से पावे और गुरु के भी छीन ले, गुरु को पकड़ के । एक शिष्य वो होवे है । दूसरा शिष्य वो होवे, जो अपने से ज्ञान नहीं पावे, गुरु जब समझावे, तब उसकी समझ में आये । तब उसको ज्ञान मिले । दूसरे शिष्य इस तरह के होए । यानी कुछ लोग ऐसे जो अपने से समझते, कुछ लोग ऐसे जो कहने से समझते । आप उनको बताओ, समझ जाए । बात को अच्छे से समझाओ, जैसे इंद्र, इंद्र जा के बतलाया, बृहस्पति को, अपने गुरु को राम भरत का मिलाप नहीं होना चाहिए, रोको । बृहस्पति समझा दिया, इंद्र समझ गया, चुप हो गया । तो कुछ शिष्य ऐसे होते जो गुरु के समझाने से समझ जाते । कुछ शिष्य ऐसे होते जो उनके अपने से समझते । कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो कहने से भी नहीं समझते । जैसे अभी हम गुरु और चेला वाली कहानी सुनाया, गुरु समझाया कि लालच नहीं करो, माया में नहीं फंसो वो बताया कि हम तो कम्बल पकड़ने जाता है और फिर कम्बल ने उसको पकड़ लिया । जो कहने से भी नहीं समझते, ऐसे  के लिए रामायण में लिखा है –

मूरख रखहि चेत, जो गुरु मिले विरंच सम

ऐसे लोग तो मूर्ख हैं, ऐसे लोगो को ज्ञान नहीं हो सकता कभी । ऐसे लोगों को ज्ञान देने के लिए गुरु के रूप में अगर ब्रह्मा भी आ जाये तो ऐसे लोगों को ज्ञान नहीं दे सकता । इसका मतलब क्या है ? इसका मतलब है कि  ज्ञान वही प्राप्त कर सकता है जिसके अन्दर ये feeling होगी, कि मुझे ज्ञान प्राप्त करना है । ज्ञान वही प्राप्त कर सकता है । जिसके भीतर ज्ञान प्राप्त करने की feeling नहीं है वो ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता है । इसी चीज को हम दूसरी तरह से बताते हैं । जो आदमी ये समझता है कि मैं तो जानता हूँ, हम तो रामायण पढ़ा है, हम तो कथा सुना है हमको कोई जरूरत नहीं है । सोचिये, जो आदमी ये सोचता है कि हमको तो ये मालूम है वो आदमी कभी नहीं सीख सके कोई चीज । सीखे वो, जो ये जानता है कि मैं नहीं जानता हूँ । हम इतना बड़ा हो गया, रामायण पढ़ते पढ़ते । कितनी बार रामायण पढ़ा, मुझे खुद ये पता नहीं । 10 and half hour में, एक sitting में एक बार रामायण पूरा पढ़ लिया । कितना बार पढ़ा होई, मैं नहीं जानता । लेकिन आज भी मुझे ये लगता कि पूरी तरह से मैं नहीं जानता । मैं अपने Teacher से भी पढ़ा, गुरु से भी पढ़ा, फिर भी मुझे लगता, कि  मैं पूरी तरह से नहीं जानता । जब तक आप ये फील करेंगे कि  आप नहीं जानते, तब तक तो आप कुछ जान सको और अगर आप ये फील करते कि आप कुछ जानते हैं, आप कुछ नहीं सीख सको । स्वामी विवेकानंद ने लिखा है एक जगह, स्वामी विवेकनद भी अमेरिका में आये थे, उन्होंने लिखा था –

ये जान लेना कि मैं अज्ञानी हूँ, ज्ञान की दिशा में पहला कदम है

जिसने ये जान लिया कि उसको नहीं आता, जानो कि  उसने knowledge के फील्ड में first step रख दिया अब उसको ज्ञान मिलेगा । मूर्ख कौन है ? कहने पर भी किसकी समझ में नहीं आता, उसकी समझ में कहने पर भी नहीं आता है जो ये समझता है कि मैं तो जानता हूँ, मैं तो समझता हूँ, मुझे तो सब मालूम है । अपने illusions को, अपने delusions को, अपने presumption को, अपने assumption को ही right मानता । मानता कि इसके अलावा और कुछ सही नहीं है । मैं जो जानता हूँ, वो ही सही है । वो ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके । गीता में श्री कृष्ण ने कहा –

श्रद्धावान लभते ज्ञानं ।

ज्ञान किसको मिलता है, जिसके मन में श्रद्धा है, ज्ञान उसको मिलता है । श्रद्धा का meaning respect नहीं है । ढेर जन समझता कि गुरु का respect करो तो ज्ञान मिल जाय । No. श्रद्धा का मतलब respect नहीं है, श्रद्धा का meaning है Admiration. Admire करना पड़ेगा । Admire ! जिसको admire करे उसके जैसा बनना मांगे हम । उसकी Copy करता । ढेर जन । कोई time में हिंदुस्तान में कोई Actor रहा, देवानंद । अब ढेर जन उसी का हेयरस्टाइल बनाता । हम देखा ढेर जन उसीका कपडा पहनता, copy करता उसीको । आज भी हम देखता कि  कोई अमिताभ बच्चन की copy करता है, Ladies कोई ऐश्वर्या राय की Copy कर रही है, कोई हेमा मालिनी की copy कर रही है ।   Why  ? They Admire them. वो उनको श्रद्धा करते हैं । श्रद्धा का Meaning कौन चीज है ? श्रद्धा का मीनिंग है कि जब हम किसी को फील करें कि He is greater then me. गुरु का मीनिंग है बड़ा । Great । ध्यान रखो, गुरु meaning केवल Great है और कोई meaning नहीं है । गुरु का meaning  कान में मन्त्र फूकने वाला नहीं है । गुरु का meaning पीले कपडे पहनने वाला नहीं है । गुरु का meaning जनेऊ पहनने वाला नहीं है । गुरु का meaning माथे पर तिलक लगाने वाला नहीं है । गुरु का मीनिंग है only Great. जब हम फील करें कि somebody is greater then me. तब कौन चीज होवे ? जब हम ग्रेट फील करे किसीको तो हमारे अन्दर से feeling होवे, कि उसके आगे झुको । उसको नमस्कार करो । जो लोग अमिताभ बच्चन को Admire करे, अमिताभ बच्चन को great feel करे, जो अमिताभ बच्चन को copy करे, जो अमिताभ बच्चन के सामने जाये, जो उसकी चिरौरी करे, खुशामद करे जरा मिलने दो । किसी तरह मिल जाऊ । एक पेपर पर दस्तखत ही करा लाऊ । बहुत से लोग जेब में कॉपी लेकर घूमता क्योंकि अमिताभ बच्चन Wait नहीं करी कॉपी का, इसलिए जेब में लेकर घूमता । तुरंत पेन, कॉपी उसको दी । क्योंकि वो उसको great समझता है । जब आप किसी को great समझता है तो आपके अन्दर से feeling होय कि उसके आगे झुको । उसकी copy करो । उस जैसा बनो । This feeling is admiration. आप भी जानते होंगे Admiration का मीनिंग । जब हम किसी के जैसा बनना मांगते, this feeling is called Admiration. क्यों मानते किसी के जैसा बनना, क्योंकि हम उसको ग्रेट मानते, अपने से बेहतर मानते । अपने से बेहतर समझते । जब आपसे कोई ग्रेट मिले, चाहे नॉलेज के फील्ड में बड़ा हो, चाहे उम्र में बड़ा हो, चाहे वो आपसे Money में बड़ा हो, चाहे आपसे किसी पोस्ट में बड़ा हो, ओहदे में बड़ा हो । हम देखा है,  कि कई जन अपने Boss को जाकर नमस्कार करें । काहे ? Post में बड़ा है । अभी यहाँ बिल क्लिंटन या जोर्ज बुश या ओबामा आ जाएँ, अचानक से मंदिर में आ जाएँ, Definitely आप सब लोग अपनी Seat से उठ कर खड़े हो जायेंगे क्योंकि आप मानता कि He is Great. चाहे वो मनी में बड़ा हो, पॉवर में बड़ा हो, किसी भी चीज में बड़ा हो, जब हम feel करते कि He is Great तब हम उसके आगे झुकना मांगे, उसका copy करना मांगे, that is admiration, that is श्रद्धा । एक चीज और ख्याल कीजिये, जब हम किसी को ग्रेट मानता, Easily हम किसी को ग्रेट मानता नहीं वैसे । हाँ, Easily किसी को ग्रेट नहीं मानता । लडकन आज कल माई-बप्पा को बताता, तुम कौन चीज जानता । अरे तुम बात करते हो उस जमाने की, उस ज़माने में कौन चीज रहा ? ग्रेट नहीं माने माई-बप्पा को लडकन । Wife husband को ग्रेट नहीं माने । greatness जब feel करी, it means अपने को छोटा मानी । दूसरे को जब बड़ा मानो तो अपने को छोटा मानना पड़े । जबकि कोई अपने को छोटा मानना नहीं मांगे । सब अपने को ही बड़ा बतावे । Rarely कोई किसी को बड़ा बतावे । बड़ा भी किस चीज में ? मनी में बड़ा हो तो बड़ा समझे, नॉलेज में बड़ा हो तो उसको बड़ा नहीं समझे । उसको तो समझे कि हम सब जानता है ये कौन नया चीज बताई । नॉलेज की greatness को तो greatness मानता ही नहीं है आज आदमी । मनी की, कपडा की, ऊपर की दिखावे की चीजों की greatness को greatness मानता आदमी । अरे ! इसके पीछे इतना भीड़ चलता, ये ग्रेट है । Assumption करता कि He is great, कहे Assumption करता ? अरे उसके पीछे इसने भीड़ चलता, he is great. Great है, तभी तो इतना भीड़ चलता है । अरे ! तुम उसका greatness देखा नहीं कभी अपने से खुद, अपने से देखो पहले greatness उसका, तब तो पता लगे कि he is great. तभी तो आप अपने को छोटा फील करेंगे । जब आप अपने को छोटा फील करेंगे, दूसरे को बड़ा फील करेंगे। It means उसके पास मनी है, मेरे पास मनी नहीं है, मैं छोटा हूँ मनी मैटर्स में, मैं उम्र में छोटा हूँ वो बड़ा है । उसके पास अनुभव ज्यादा है मेरे पास अनुभव नहीं है । वो knowledge में ग्रेट है, उसके पास knowledge है, मेरे पास knowledge नहीं है । यानी कि जब अपने को छोटा फील करे, माने कि मेरे पास नहीं है वो चीज तब तो उस को पाने की फीलिंग हो । तब ज्ञान प्राप्त होई, जब श्रद्धा मन में होई । इसलिए गुरु के प्रति पहले श्रद्धा पैदा करो । पहले फील करो कि He is great और इसको Assume नहीं करो कि वो आदमी great है । हम चाहे जिसको great मान लेता, सब लोग कह रहे हैं इसलिए हम मान लेता कि वो great है । अपनी अक्ल से तो काम किया नहीं । Assume करते हम, गुरु के मामले में, कि ये गुरु है ये great है । कपड़ों से assumption करते, उसके पीछे चलने वाली भीड़ से assumptionकरते, उसके dress code से assumption करते । उसके पाखण्ड से हम assumption करते कि he is great. That is Wrong. उसके ज्ञान को देखो, उसकी नॉलेज को देखो, उससे discuss करो, तब पता लगी, कि he is great or not. अगर वो ग्रेट है, तो उसको गुरु मानो, this is truth लेकिन प्रॉब्लम सबसे बड़ा ये है आदमी truth को जानना नहीं मांगता है । काहे नहीं जानना मांगे truth को, क्योंकि अगर truth  को जाने तो assume करने का मौका नहीं रहे फिर । assume तो तभी तक करे जब तक truth सामने नहीं है । आदमी आजकल सबसे ज्यादा किस चीज से डरता है ? सबसे ज्यादा डरता है truth से । सबसे ज्यादा डरे अपने आप से, अपने भीतर झांक के नहीं देखे आदमी कि मैं कौन चीज करता हूँ, मैं कैसे करता हूँ, मैं कैसे फील करता हूँ, मेरे भीतर कितना भ्रम भरा पड़ा है, इसको नहीं सोचता । दूसरे को बतावे कि वो बड़ा गलत करता है, वो ऐसा है, वो वैसा है, सब बात दूसरों के बारे में करे आदमी । 80% बात दूसरों के बारे में करे आदमी, अपने बारे में बात नहीं करते हैं । कबीर बताते हैं कि –

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय, जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ।

अपने भीतर जब झांकोगे तब पता चलेगा कि सबसे ज्यादा गन्दा तो भीतर है । बाहर जिसे आप गन्दा कह रहे हैं, वो गन्दा नहीं है । लेकिन मूर्ख आदमी, माया में फंसा हुआ आदमी, Assumption, Presumption, illusion, delusion में फंसा हुआ आदमी बोलता कि दुनिया बड़ा ख़राब है, जमाना बड़ा ख़राब है । Time बड़ा ख़राब चलता है,  भाग्य बड़ा ख़राब है, भगवांन बड़ा खराब है, हमारी नहीं सुनता और सबकी सुनता है यानी भगवान् भी बेइमान है उसके लिए, पूजा भी करता जायेगा और कहता भी जायेगा कि हमारी नहीं सुनता जबकी हम कितनी पूजा करता है । सब ख़राब है, तू अच्छा है ? अरे ! अपने भीतर झाँक सबसे ज्यादा ख़राब तो तू ही है और सब अच्छा है । इस truth को आदमी जानना नहीं मांगे, आदमी सबसे ज्यादा डरता है truth से, आदमी सबसे ज्यादा डरता है अपने आप से । सीनियर्स को देखो, सीनियर्स आपस में बात करी, Past की । अरे वो जमाना बड़ा अच्छा था । लडकन माई-बप्पा का respect करते रहे, एक आवाज लगाता हमारा बाप तो हम दौड़ कर जाते थे । आज का लड़का तो कुछ भी नहीं करे, माई-बप्पा को कुछ समझे ही नहीं । जिस सीनियर से मिलो always आपसे past की ही तारीफ़ करता मिले । कोई कोई तो सीनियर बतावे कि  अंग्रेजों का राज बड़ा अच्छा  रहा । अब राज ख़राब है, इंडिया में । फिजी में भी बताता है । काहे अंग्रेज का राज अच्छा बताता है भाई । क्योंकि past अच्छा है । लडकन से मिलो, youngsters से मिलो, वो future देखी । जितना भी लडकन मिली, सब  future की ही बात करे । लड़के और सीनियर दोनों में से एक भी present का बात नहीं करी । Because present is truth, truth में जाना नहीं मांगता, truth से डरता, truth को देखना नहीं मांगता । या तो past को  देखी या future को देखी । सबसे ज्यादा आदमी डरता truth से । जब तक truth से डरते रहोगे, तब तक माया में फंसे रहोगे । तभी तक illusion होई, तभी तक delusion होई, तभी तक assumption होई, तभी तक presumption होई, जब तक truth को नहीं जानो । God is Truth. सत्य को जानो और सत्य को जानने के लिए जितना भी पहले से भीतर भरा पड़ा है उसको पहले बाहर निकालो । ये सबसे बड़ा चीज है और गुरु का काम है कि आपके भीतर की माया को नष्ट करे, ज्ञान दे और शिष्य का काम है कि माने मेरे भीतर माया भरी पड़ी है, अज्ञान भरा पड़ा है और इसको बाहर निकालना है, ज्ञान प्राप्त करना है ।

बोलिए श्री भगवान् राम चन्द्र की जय, श्री गुरु महाराज की जय

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December 11, 2017

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