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ज्ञान, शिक्षा और प्रतिभा

knowledge 1

बचपन में मैंने अंग्रेजी निबन्धकार ए.जी. गार्डनर का अज्ञान की सुरक्षा में एक निबन्ध पढ़ा था- In Defense of ignorance. यह निबन्ध लेखक ने किसी विद्यार्थी के द्वारा पूछे गये एक प्रश्न के उत्तर में लिखा था । विद्यार्थी का प्रश्न था कि कृपया बताएँ कि मुझे कौन-कौन सी पुस्तकें पढ़नी चाहिये? जिससे मैं भी आप जैसा विद्वान बन सकूँ । इस सम्पूर्ण निबन्ध में लेखक ने यह बताया था कि तुम मुझे विद्वान समझते हो किन्तु मैं अपने ड्राइवर के सामने बड़ा अज्ञानी सिद्ध हुआ जब कार में चलते हुए सड़क के किनारे के वृक्षों को देख कर मैंने उन्हें पाम के वृक्ष कहा और मेरे ड्राइवर ने मुझे बताया कि श्रीमान ये पाम के नहीं यूकिलिप्टस के वृक्ष हैं । अपने बारे में इस तरह की एक-दो घटनाओं का उल्लेख करने के बाद लेखक ने लिखा कि एक डॉक्टर जिसे शरीर की बहुत सी नसों, नाड़ियों, हड्डियों तथा कोशिकाओं आदि का ज्ञान होता है, वह भी यह दावा नहीं कर सकता कि वह प्रत्येक कोशिका आदि के बारे में जानता है । इसी प्रकार एक खगोलविद् बहुत से आकाश पिण्डों के बारे में जानता है किन्तु प्रत्येक तारे के बारे में जानने का दावा वह भी नहीं कर सकता । तुम समझते हो कि अरस्तू और दाँते आदि दार्शनिक बहुत बड़े विद्वान थे किन्तु वे एक किसान के खेत जोतने वाले अपढ़ पुत्र की अपेक्षा बहुत अज्ञानी थे, क्यों कि वे खेत जोतना नहीं जानते थे । निबन्ध का निष्कर्ष था कि इस संसार में कोई भी पूर्ण ज्ञानी नहीं है, अतः तुम किसे ज्ञानी कहोगे?

इस निबन्ध में मुझे निबन्धकार की जिन दो बातों ने बड़ा प्रभावित किया । उनमें पहली बात तो थी निबन्धकार की अपने ज्ञान के प्रति अहंकारशून्यता और दूसरी बात थी कि वस्तुतः दुनिया में कोई भी ज्ञानी नहीं है, सभी अज्ञानी हैं । मुझे लेखक की बात बड़ी सच्ची लगी । इस दृष्टि से निबन्ध का शीर्षक भी “अज्ञान की सुरक्षा में” बहुत सार्थक था ।

फिर बी.ए. में संस्कृत विषय में गीता पढ़ने का अवसर मिला तो उसमें पढ़ा-

नासतोविद्यतेभावः नाभावोविद्यते सत ।

अर्थात् जो असत है उसका कहीं भी होना नहीं पाया जाता और जो सत है उसका कहीं भी अभाव नहीं है । मैं सोचने लगा जब सत का कहीं अभाव नहीं है यानी सत सभी जगह विद्यमान है तो फिर ज्ञान तो सत है, उसका अभाव कैसे हो सकता है? हाँ अज्ञान जो असत है, वह कहीं भी नहीं होना चाहिये । अब मुझे लगने लगा निबन्धकार गार्डनर शायद गलत थे, हमारी गीता गलत नहीं हो सकती । वैसे भी दुनिया में देखने में आता है कि एक अज्ञानी कहलाने वाला व्यक्ति भी कुछ न कुछ जानता अवश्य है । कुत्ता तैरना जानता है किन्तु बहुत से पढ़े-लिखे मनुष्य नहीं जानते, तो फिर अज्ञानी कौन है । कुत्ता या मनुष्य?

मुझे लगा कि इस संसार में कोई भी अज्ञानी नहीं है । इसीलिये दत्तात्रेय ने चौबीस गुरु बनाए थे । उन गुरुओं में मधुमक्खी भी थी । एक लुहार जैसा अपढ़ व्यक्ति भी था । मुझे विद्यार्थियों के लिये कही जाने वाली संस्कृत की एक सूक्ति याद आने लगी है-

काकचेष्टा बकोध्यानं श्वान निद्रा तथैव च । अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्च लक्षणम् ॥

इस सूक्ति में विद्यार्थियों को कौए, बगुले और कुत्ते से कुछ बातें सीखने के लिये प्रेरित किया गया है । अपने इन गुणों के कारण निश्चय ही ये सभी ज्ञानी हैं । क्योंकि शिक्षा तो ज्ञानियों से ही ली जाती है । फिर अज्ञानी कौन है? अब मुझे लगता है कि संसार में कोई भी अज्ञानी नहीं है । अब तो मुझे गार्डनर महोदय की अपने अज्ञान के विषय में नम्रता तथा अहंकारशून्यता भी छद्म लगने लगी है । अपने को अज्ञानी कहने के साथ-साथ उनने सभी विद्वानों को अज्ञानी घोषित कर दिया । अपने अज्ञान को स्वीकार करने के लिये सब को अज्ञानी कहना नम्रता नहीं हो सकती । यह नम्रता, औद्धत्य का ही छद्म रूप है ।

खैर जो भी हो, गार्डनर महोदय और गीता के कथन, दोनों ही दो पृथक् चिन्तन पद्धतियों के परिणाम हैं । गार्डनर महोदय की चिन्तन पद्धति अभाववादी और गीता की चिन्तन पद्धति भाववादी है । एक negative सोच है दूसरा positive सोच है । संसार में दो ही प्रकार के सोच हो सकते हैं । पश्चिम के सभी दर्शनों को पढ़ने से तो यही निष्कर्ष निकलता है । पश्चिम के सभी दर्शन मुर्गी और अण्डे के झगड़े में समाप्त होते हैं । मैंने जब व्यक्तिवाद पढ़ा तो मैं बड़ा प्रभावित हुआ । मुझे लगा यही परम सत्य है । व्यक्ति ही समाज की धुरी है, वही समाज का निर्माण करता है । अतः व्यक्ति को सर्वतः स्वतन्त्र होना चाहिये । लेकिन जब समाजवाद पढ़ा तो लगा कि समाज व्यक्ति का निर्माता होता है अतः व्यक्ति को समाज के नियमों में बँध कर रहना चाहिये, अन्यथा बड़ी अव्यवस्था फैल जायगी । यही हाल आदर्शवाद और उपयोगितावाद का भी है । ईश्वर ने मनुष्य को बनाया या मनुष्य ने ईश्वर को । पूँजीवादी व्यवस्था ठीक है कि साम्यवादी । है न मुर्गी अण्डे का सवाल । क्या सच है, पता ही नहीं लगता । दोनों के तर्क इतने सबल हैं कि दूसरे को झुठला नहीं सकते । बचपन से हम यही सब पढ़ते आ रहे हैं । यही शिक्षा है ।

ऐसा नहीं है कि यह मुर्गी अण्डे का सवाल केवल साहित्य, दर्शन आदि कला संकाय के विषयों के साथ ही हो । यही स्थिति विज्ञान में भी है । खगोल विज्ञान में दशकों तक माथा-पच्ची करने के बाद मुझे पता लगा कि हजारों साल तक चली भूकेन्द्रित गणना पद्धति और वर्तमान सूर्य केन्द्रित गणना पद्धति, दोनों में वास्तविक कौन सी है, जब कि गणनाओं के परिणाम दोनों से समान आते हैं । मेरी दृष्टि में यह केवल दृष्टि कोंण का अन्तर है । किसी विषय या वस्तु को आप जैसे नजरिये से देखेंगें वह वैसी ही नजर आयेगी । जिस गिलास में आधा पानी भरा हो उस गिलास को अधा भरा हुआ भी कह सकते हैं और आधा खाली भी । किन्तु कथन की पूर्णता तभी है जब आप दोनों बातें कहैं अन्यथा की स्थिति में आप अर्धसत्य ही बोल रहे होंगें । यही स्थिति ज्ञान की भी है । केवल एक दृष्टिकोंण से जो प्राप्त किया गया है, वह ज्ञान नहीं जानकारी हो सकता है । पूर्ण ज्ञान वही हो सकता है जो विभिन्न दृष्टिकोंणों से जानने के बाद निष्कर्ष रूप में होता है । इसी को ऋत् या परमसत्य या अन्तिम सत्य कहते हैं । सत्य बहुत से हो सकते हैं किन्तु ऋत् बहुत से नहीं होते । जिस प्रकार बहुत से तथ्यों में से थोड़ा सा सत्य निकलता है, उसी प्रकार बहुत से सत्यों में से थोड़ा सा ऋत् निकलता है । यही ज्ञान है । यदि हम एक लकड़ी के तख्ते को ऊपर से देखेंगें तो हम को उसकी लम्बाई और चौड़ाई का ज्ञान तो हो जायगा किन्तु उसकी मोटाई को जानने के लिये हमें उसे उसकी मोटाई की दिशा से देखना पड़ेगा ।

इसी प्रकार किसी व्यक्ति को उसकी पीठ की ओर से देखेंगें तो वह कुछ और तरह का दिखाई देगा और सामने से देखने पर कुछ और तरह का दिखाई देगा । उसे पूरा जानने के लिये उसे हर ओर से देखना पड़ेगा । ज्ञान प्राप्त करने के लिये विभिन्न तथ्यों में से कुछ सत्य निकालने पड़ते हैं । फिर उन सत्यों में से (भले ही वे सत्य परस्पर विरोधी ही क्यों न हों) ऋत निकालना चाहिये । तभी व्यक्ति ज्ञानी होता है ।

किन्तु आज कल तथ्यपरक शिक्षा पर बहुत जोर दिया जा रहा है । उच्च शिक्षा में उसे सत्यपरक बनाने की भी चेष्टा होती है । किन्तु ऋत तक पहुँचाने की चेष्टा आज की शिक्षा नहीं करती । यह तो स्वयं ज्ञानार्थी को ही करनी पड़ती है । अध्यापक और पुस्तकों के लेखक दोनों ही अपने पक्ष के साथ अपने को स्थापित करने के लिये विरोधी पक्ष को पूरी तरह समझे बिना, उसकी सतही बातों अथवा उस पक्ष के वास्तविक मन्तव्य के स्थान पर अपनी समझ को थोप कर उसका खण्डन करने में ही अपने ज्ञान की महत्ता सिद्ध करते हैं ।

बहुत समय से शिक्षा की यही सबसे बड़ी समस्या रही है कि शिक्षकों की अहम्मन्यता के कारण शिक्षार्थी को प्रायः शिक्षकों का दृष्टिकोंण ही पढ़ना और समझना पड़ता है, वह एक तरह से इसके लिये बाध्य होता है । प्रायः ऐसे शिक्षक जिस दृष्टिकोंण को पसन्द करते रहे हैं उसे विस्तार से पढ़ाते रहे हैं और जो दृष्टिकोंण उन्हें अच्छा नहीं लगता रहा उसे संक्षेप में बता कर उसी कमियाँ गिना देते रहे हैं । शिक्षा के क्षेत्र में अपने शिक्षार्थियों के प्रति यह ज्ञान की चोरी है । कभी-कभी तो शिक्षक दूसरे दृष्टिकोंण को पूरी तरह ख़ुद भी नहीं समझते, तो विद्यार्थियों को क्या बतायेंगें । यही स्थिति लगभग पुस्तकों की भी रही है । उनमें भी प्रायः सम्पूर्ण विषय एकांगी ही रहता है । बहुत से लेखक और प्रकाशक प्रायः यह रोना रोते हुए देखे जाते हैं कि पुस्तकों के पाठक कम होते जा रहे हैं । पुस्तकों की बिक्री बहुत कम हो रही है । वे लेखक नहीं सोचते कि पुस्तकों में आजकल लिखा क्या जा रहा है । पैसा बनाने के लिये और अपने को लेखक सिद्ध करने के लिये, पाँच किताब सामने रख कर एक छठी किताब तैयार कर दी जाती है । उसे क्यों कोई पढ़े? जबकि वह सब कुछ जो उसमें लिखा है, पाठकों को पहले से ही उपलब्ध है । हाँ, जो बिक रही हैं वे हैं गाइड और मेड ईज़ी पुस्तकें हैं । उनका आग्रह है, मूल पुस्तकों को पढ़ने की क्या आवश्यकता है । बस हमारी गाइड पढ़ लीजिये । आप परीक्षा में पास हो जायेंगें । कितना आसान तरीका है । किसी ग्रंथ के दो अध्याय कोर्स में हैं तो क्या जरूरी है कि आप पूरी पुस्तक खरीदें । प्रकाशक और अध्यापक पैसे के लोभ में केवल उन दो अध्यायों को पृथक् से छाप देते हैं । कितनी आसान शिक्षा पद्धति है । लेखक-अध्यापक भी खुश, प्रकाशक भी खुश, विद्यार्थी भी खुश कि कम से कम पढ़ना पड़ रहा है । इसमें केवल पुस्तकों के लेखक या शिक्षक ही दोषी हों, ऐसी बात नहीं है । प्रायः इसमें सरकारें और समाज, उनसे भी बड़ा दोषी होता है । जब सरकार या समाज किसी ख़ास तरह के मनुष्य चाहते हैं तो अपने स्वार्थ में वे शिक्षा को जानबूझ कर एकांगीं कर देते हैं । तब विद्यार्थियों को एकांगीं शिक्षा देना अध्यापकों की विवशता हो जाती है । ऐसी स्थिति में चाह कर भी अध्यापक विद्यार्थियों को ज्ञान प्रदायिनी शिक्षा नहीं दे सकता । मैकाले की शिक्षा पद्धति यही थी । आज वर्तमान शिक्षा पद्धति एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नहीं विभिन्न कम्पनियों की बँधुआ हो कर रह गयी है । भारत सरकार में इसी कारण कोई शिक्षा मन्त्रालय नहीं है । उसके स्थान पर है-मानव संसाधन विकास मन्त्रालय । भारत सरकार का उद्देश्य अपने देश के लिये ज्ञानी जन और सुविज्ञ नागरिक बनाना नहीं है, अपितु कम्पनियों और सरकारों के लिये मनुष्य को सस्ते संसाधन के रूप में पेश करना है । ताकि बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ भारत में आयें और भारत में पूँजी निवेश करें । कितना अच्छा उद्देश्य है । भारत सरकार थोडा सा धन प्राप्त करने के लिये अपने नागरिकों को विदेशी कम्पनियों के लिये संसाधन के रूप में देगी और कम्पनियाँ उससे सरकार से भी अधिक धन कमाएँगीं । बदले में उस बेचारे संसाधन को भी रोजी-रोटी मिल जायगी । जहाँ शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान के स्थान पर धन हो, वहाँ सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था धन पर तो टिक ही जायेगी । चूँकि शिक्षा का उद्देश्य धन कमाना है, तो धन कमाने के लिये धन खर्च भी करना पड़ेगा । शिक्षा बिकने लगेगी । अब शिक्षा भी एक इण्डस्ट्री है । धन खर्च करो, शिक्षा पाओ, धन कमाओ । गरीब आदमी के लिये शिक्षा में कोई जगह नहीं रहेगी । फलतः सरकारी स्कूल और गैर सरकारी स्कूलों की शिक्षा में अन्तर आ गया । इस शिक्षा पद्धति में सरकार का उद्देश्य क्या केवल धन कमाना ही है? नहीं इसके पीछे एक गुप्त उद्देश्य और भी है । मनुष्य को एकांगीं शिक्षा देकर उसको सच्चे ज्ञान से वंचित रखना । ताकि व्यक्ति केवल पढ़े-लिखे और रोजी-रोटी की चिन्ता में लगा रहे, तथाकथित स्टेटस बनाने में लगा रहे । इस तरह व्यक्ति अपने में ही फँसा रहे, सरकार के धत्‌करमों पर विचार न करे । ऊँची शिक्षा का अर्थ ऊँचा पैसा कमाना कर दिया गया है । अब सरकारों को अच्छे नागरिकों की नहीं, अपितु नागरिकों के स्थान पर वोट और संसाधनों की आवश्यकता है । यही कारण है कि इस शिक्षा से विद्यार्थी के मन और मस्तिष्क के खिड़की-दरवाज़े पूरी तरह नहीं खुलते ।

भारतीय प्राचीन विद्याओं की शिक्षा के क्षेत्र में तो बहुत समय से रट्टू तोतों को ही परम विद्वान और प्रतिभावान समझा जाता रहा है । आधुनिक शिक्षाविद् अब तक तो किसी पेड़ के नीचे टाट पर बैठ कर और गुरुजी की मार खाकर पढ़ने को ही प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति मानते रहे हैं । इस रटाई से शिक्षार्थी की केवल एक खिड़की या एक किवाड़ खुल कर रह जाती है । उस एक खिड़की या दरवाजे पर भी शिक्षा माफ़िया बैठ गये हैं । वे उसे भी नहीं खुलने देते । सर्टिफ़िकेट और डिग्री दिलाने के लिये पढ़ने के अलावा और भी रास्ते वे खोज लेते हैं । ऐसी व्यवस्था में कुछ मुन्नाभाई भी शिक्षित होने का ख़िताब पा जायें तो आश्चर्य की बात नहीं है ।

हाँ, कुछ प्रतिभावान या जिज्ञासु किस्म के विद्यार्थी अपने पारिवारिक या अच्छे अध्यापकों की कृपा से इस एकांगी शिक्षा से आगे सत्य तक पहुँचने का प्रयास करते हैं और उन में से कुछ सत्य के निकट पहुँचते भी हैं । किन्तु शिक्षा प्राप्त कर रहे लोगों में इनका प्रतिशत नगण्य जैसा होता है । उनमें से भी अधिकांश ऊँची तनख्वाह और सम्मान जनक जीवन के लोभ में भारत से बाहर दूसरे देशों में चले जाते हैं । उनके ज्ञान का लाभ अपने देश को नहीं मिल पाता । तब देश का नेतृत्व और बुद्धिजीवी कुछ दिन ब्रेनड्रेन का रोना रोकर शान्त हो जाते हैं । इनमें से कुछ प्राइवेट कम्पनियों में चले जाते हैं । बहुत थोडे से लोगों के ज्ञान का लाभ ही देश को मिल पाता है । अन्यथा शेष तो ऊँचे रुतबे, और ऊपर की कमाई के लालच में ही सरकारी नौकरियों में जाते हैं ।

पिछली यू.पी.ए. सरकार के समय से अब की यू.पी.ए. सरकार तक शिक्षा के क्षेत्र में रोज नये-नये प्रयोग किये जा रहे हैं । परीक्षा पद्धति में परिवर्तन, शिक्षा में विदेशी पूँजी निवेश की चेष्टा के साथ-साथ पूरे देश की शिक्षा में एकरूपता लाने के लिये प्रतिदिन प्रयास किये जा रहे हैं । पूरे देश की शिक्षा में एक रूपता लाने का अर्थ है, शिक्षा में अन्य दृष्टिकोंणों का मार्ग अवरुद्ध कर देना । मजे की बात है कि शिक्षा सम्बन्धी नीति का निर्धारण मन्त्री और उन के चहेते शिक्षाविदों को करना है । सब की राय या आम राय के लिये कहीं कोई गुंजाइश नहीं है । क्योंकि इसमें उनकी विचारधारा के विरुद्ध विचारों के सामने आने का खतरा रहता है । उत्तर प्रदेश सरकार का एक कानून जो बनने जा रहा है, वह तो इस दिशा में और भी आगे की सोच है । इसके अनुसार विश्वविद्यालयों के  कुलपति शिक्षाविद नहीं, प्रशासनिक अधिकारी बनाये जायेंगे | यद्यपि पहले बिना कानून के अर्थात गैर-कानूनी तरीके से यही सरकार कुछ विश्वविद्यालयों में ऐसा कर भी चुकी है । अब उसे कानूनी रूप देने की चेष्टा हो रही है । हो सकता है, आगे कभी ऐसा भी समय आये जब अध्यापन का कार्य भी प्रशासनिक अधिकारियों को ही सौंप दिया जाय । पिछले कुछ वर्षों से उत्तर प्रदेश में स्नातक पूर्व की परीक्षाएँ तो अब बिना प्रशासनिक अधिकारियों और बिना पुलिस की सहायता के हो ही नहीं रहीं हैं । दूसरे प्रान्तों में अभी कुछ गनीमत है । जो भी है, सरकारों का प्रयत्न है कि भारत के हर व्यक्ति को शिक्षित बनाना है ।

ऐसा नहीं है कि शिक्षा के क्षेत्र में यह सब अभी होने लगा है । सदियों से शिक्षा को राजाओं ने, तो कभी सम्प्रदायवादियों ने तथा आजकल पूँजीवादियों ने अपनी दासी बना कर रखा है । कदाचित् मध्यकालीन कवि कबीर ने तथाकथित ज्ञान के ठेकेदारों को ललकारते हुए कहा था-

तू बाभन मैं काशी का जुलाहा, बूझउ मोर गियाना ।

समस्त शिक्षा और पुस्तकों की भी खिल्ली उड़ाते हुए कहा था

कबीर पढ़िबा दूरि कर पुस्तक देई बहाइ ।

तथा

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, भया न पण्डित कोई ।

 जैसी उक्तियाँ कहीं थीं । अवश्य ही आज की तरह उस समय की शिक्षा भी मनुष्य को संवेदनहीन संसाधन बना रही होगी । पाश्चात्य चिन्तक रूसो ने जब कहा था कि बच्चों को यदि सही शिक्षा देनी है तो संसार के सारे पुस्तकालयों में आग लगा देनी चाहिये, तो उसके पीछे भी उनकी शिक्षा में एकांगी चिन्तन धारा के प्रति खीज रही होगी । यह एकांगी विचारधारा वाली शिक्षा मनुष्य को कितना असहिष्णु बना देती है । इसके अनेक प्रमाण पश्चिमी देशों के इतिहास में मिलते हैं । आत्मा की सत्ता को स्थापित करने के कारण यूनान में सुकरात को पुराने शिक्षाविदों के द्वारा विष पीने के लिये विवष किया गया था । फ़ादर कौपरनिकस ने जब कहा कि सूर्य नहीं पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, तो चर्च से उस को निकाल दिया गया । ये शिक्षित लोगों की नव्य शिक्षा और विचारों के प्रति असहिष्णुता नहीं तो और क्या है? एकांगी शिक्षा जिसमें मनुष्य को ज्ञानी बनाने के स्थान पर संसाधन बनाया जाता है । मनुष्य को केवल असहिष्णु ही नहीं संवेदनहीन भी बना देती है । गाँव में किसी पर विपत्ति आने पर गाँव के अपढ़ लोग एक जुट हो जाते हैं । जानवर भी अपने सजातीय के दुःख में इकट्ठे होते हुए देखे जाते हैं । किन्तु तथाकथित शिक्षित और बुद्धिजीवी जिनसे विशेष संवेदनशील होने की आशा समाज संजोता है, एक नहीं होते । इमर्जैंसी के दिनों में फणीश्वर नाथ ’रेणु’ जेल में डाल दिये जाते हैं और महाकवि हरवंशराय ‘बच्चन’ रेडियो पर इमर्जैंसी के पक्ष में बयान देते हैं ।

हमारी दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य विद्या प्रदान करना होता है । टैक्नीशियन बनाना, जीवनोपयोगी कलाएँ सिखाना शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिये समाज और सरकार कुछ हद तक corporate जगत के लिये मानव संसाधन जुटाना भी शिक्षा का उद्देश्य हो सकता है । किन्तु शिक्षा के बहाने इसे जीवन का उद्देश्य बना देना अनुचित है । हर व्यक्ति को सर्टिफ़िकेट और डिग्री देकर बेकारों की फौज खड़ी करना किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता । ऐसी शिक्षा उन्ही को दी जानी चाहिये जिनमें ज्ञान की पिपासा के स्थान पर केवल शिक्षित होकर रोजी-रोटी कमानी हो, जिनमें संवेदनशीलता की अधिक गुंजायश न हो । अन्यथा जिज्ञासुओं, प्रतिभावानों और सत्य से आगे ऋत की खोज तक जाने वालों को रोजी-रोटी की अन्धी दौड़ से बचाना चाहिये । उनके भरण-पोषण का दायित्व सरकारों और समाज का होना चाहिये ।

ऊपर हम जिस ऋत अथवा ज्ञान की चर्चा कर आये हैं उस तक पहुँचने के लिये प्रतिभा की आवश्यकता होती है, जो सभी के पास नहीं होती । आज कल तो परीक्षा में ऊँचे अंक पाने वाले को ही प्रतिभावान समझ लिया जाता है । किन्तु प्रतिभा का बहुत सी किताबें रट लेने या अधिक अंक ले आने से कोई संबंध नहीं होता । प्रतिभा को हमारे यहाँ ‘नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा’ कहा गया है । अर्थात् बुद्धि का वह विभाग जो नये-नये क्षितिज (नये-नये खिड़की- दरवाजे) खोल सकता हो । प्रतिभावान व्यक्ति बुद्धि का सर्वाधिक प्रयोग करता है । अस्तु निर्भ्रान्त रहता है । बहुत बौद्धिक परिश्रम के बाद कोई ऐसा सत्य खोज लेना जो किसी उतने तर्कपूर्ण और सबल किसी अन्य तर्क का विरोधी हो, प्रतिभा नहीं कहा जा सकता । प्रतिभा का कार्य तो बहुत से सत्यों के संचय के बाद प्रारम्भ होता है । किसी व्यक्ति की ऐसी क्षमता कुछ समय के लिये समाज की दिशा और सोच तो बदल सकती है । किन्तु समस्याओं का अन्तिम हल प्रस्तुत नहीं कर सकती । वह कालान्तर में मत-वादों को ही बढ़ाएगी जो समाज और व्यक्ति को भ्रमित करेंगें । प्रतिभा का कार्य विरोधी और विपरीत विचारों को खोजना नहीं अपितु उनमें ऐक्य और साम्य खोजना होता है । आधुनिक भौतिक विज्ञान के जनक आइंस्टीन का सापेक्षिकता का सिद्धान्त (Theory of relativity) प्रतिभा की देन है । किन्तु कॉपर्निकस का खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भूकेन्द्रिक सिद्धान्त के विरुद्ध सूर्य केन्द्रित सिद्धान्त प्रतिभा का परिचायक नहीं है । जो लोग नये और पुराने में विरोध या किसी एक मत से दूसरे मत की श्रेष्ठता खोज रहे हैं, उनका यह कार्य प्रतिभा का परिचायक नही है । अपितु किसी नए मत की स्थापना मात्र है जो भविष्य में विवाद और भ्रान्तियों को ही जन्म देगा । भारत में भी और पश्चिमी देशों में भी यह कार्य पिछले दो ढाई हजार सालों में बहुत हुआ है । फलतः विदेशों में साहित्य के क्षेत्र में शास्त्रवाद, नव्य शास्त्रवाद, रोमाण्टीसिज़्म आदि अनेक मत बनते और बिगड़ते रहे । इसी प्रकार दर्शन के क्षेत्र में व्यक्तिवाद, समाजवाद, आदर्शवाद, उपयोगितावाद आदि अनेक मत खड़े हो गए । सम्प्रदायों के क्षेत्र में दुनिया में अनेक सम्प्रदाय हैं और उनमें भी जाने कितने पंथ और मतमतान्तर हैं । इन मतवादों से भारत भी अछूता नहीं रहा । यहाँ भी समय-समय पर जाने कितने सम्प्रदाय और पंथ तथा मतमतान्तर आज भी बनते चले जा रहे हैं । ये सभी मनुष्य को भ्रमित अस्तु उसकी बुद्धि और ज्ञान को कुण्ठित ही कर रहे हैं । ऐसा नहीं है कि कोई नया विचार आने पर पुराना समाप्त ही हो जाता है । हो सकता है उसके मानने वाले कम हो जाँय या कुछ काल तक लोग उसको भूले रहें अथवा वह विचार किन्हीं कारणों से दब जाय किन्तु कोई भी विचार कभी नष्ट या समाप्त नहीं होता । मनुष्य मर जाते हैं, विचार नहीं मरते । वे फिर किसी विचार के विरुद्ध किसी न किसी रूप में उभर आते हैं ।

प्रतिभा का काम नये-नये विचार देना नहीं विचारों में सामञ्जस्य खोजना होता है । विभिन्न विचारों को एक सूत्र में पिरोना होता है । प्रतिभा प्रायः दो असम्बन्ध से लगने वाले पदार्थों में भी सम्बन्ध खोज लेती है । दो विपरीत वस्तुओं और विचारों में भी सामञ्जस्य स्थापित कर लेती है । जब किसी कवि ने पहली बार मुख को चन्द्रमा और आँखों को कमल के रूप में अनुभव किया होगा तो वह उस समय का सबसे अधिक प्रतिभावान कवि होगा । हाँ, बाद में इन्हीं उपमा या रूपकों को दुहराने वाले प्रातिभ कवि नहीं कहे जा सकते । न्यूटन ने जब प्रत्येक पदार्थ के गिरने का सम्बन्ध, भूमि की आकर्षण शक्ति से जोड़ा तो वह उस समय का सर्वाधिक प्रतिभावान व्यक्ति था । आज उस सिद्धान्त को ज्यों का त्यों पढ़ाने वाले प्रतिभावान नहीं कहे जा सकते ।

प्रतिभा के लिये मनुष्य में अनन्त जिज्ञासा और तर्क शीलता के साथ-साथ संवेदनशीलता भी अनिवार्य होती है । कोरे तर्क और जिज्ञासा से प्राप्त जानकारी को ज्ञान कहते हैं किन्तु उसके संवेदनशीलता से जुड़ने पर वह ज्ञान ’वेद’ कहलाने का अधिकारी हो जाता है । वेद से युक्त व्यक्ति को ही विद्वान कहते हैं । जिसमें संवेदना नहीं है वह शिक्षित हो सकता है विद्वान नहीं । यही कारण है कि बहुत से वैज्ञानिक भी कवि हुए हैं । और भारत तो विद्वत्ता के मामले में विश्व का सर्वाधिक सम्पन्न देश रहा है । यहाँ गणित, खगोल, जैसे विषयों के ग्रंथ भी काव्य में लिखे गये । भारत के महान गणितज्ञ और खगोलविद् भास्कराचार्य की कवित्व शक्ति अच्छे-अच्छे कवियों से भी श्रेष्ठ है ।

प्रतिभा किन्हीं बाह्य साधनों की मोहताज़ नहीं होती । प्रतिभा के लिये किसी सरकारी सहायता या अनुकूल पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों की आवश्यकता नहीं होती । आइंस्टीन महोदय की पत्नी उनके अनुकूल नहीं थीं फिर भी उनकी प्रतिभा का विकास हुआ । कहते हैं संस्कृत के महान कवि भारवि की पत्नी प्रायः उनकी गरीबी के कारण उनको उपालम्भ दिया करतीं थीं । महाकवि भूषण की भाभी अपने भाई के आश्रित रहने के कारण भूषण पर ताने कसती थीं । कबीर, सूर, तुलसी जैसे महाकवि किसी सम्पन्न और सुविधा प्राप्त परिवार में उत्पन्न नहीं हुए थे और न ही उनको समाज से ही कोई अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त हुईं थीं । फिर भी उनकी प्रतिभा अप्रतिम थी । इसीलिये कहा जाता है कि प्रतिभा प्रायः विषम परिस्थितियों में ही विकसित होती है । प्रतिभावान व्यक्ति को बचपन से ही अपने परिवार और अपने आसपास से परस्पर विरोधी अस्तु वैविध्यपूर्ण जानकारियाँ मिलती हैं । वह उन में रहने का आदी होने लगता है । उसे किसी भी मत से विरोध या सहमति नहीं रहती । उसकी जिज्ञासा मन के अनुकूल और प्रतिकूल सभी बातों को जानना चाहती है । वह किसी विचार या परिस्थिति के प्रति असहिष्णु नहीं होता । प्रतिभा के विकास के साथ-साथ मनुष्य की भेद बुद्धि समाप्त होती जाती है । इसलिये उस पर अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियों का कोई प्रभाव नहीं होता । वह धीरे-धीरे तर्कबुद्धि से ऊपर उठ कर अपने चित्त में प्रवेश कर जाता है, जहाँ किसी प्रकार के भेद नहीं होते । तर्क बुद्धि भेद उत्पन्न करती है । किन्तु प्रतिभावान व्यक्ति परस्पर विरोधी परिस्थितियों और विचारों में रहते-रहते उनमें सामञ्जस्य स्थापित करने की कला सीख जाता है । अतः उसकी तर्क बुद्धि शान्त होकर चित्त की वृत्तियों का भी निरोध कर देती है । उसके लिये आध्यात्मिक और भौतिक जगत में कोई अन्तर नहीं रहता । उसके लिये सभी सम्प्रदाय एक से होते हैं किसी में कोई विशेषता नहीं रहती । उसके लिये विज्ञान और साहित्य के सिद्धान्तों में अन्तर नहीं रहता । वह विज्ञान का विद्यार्थी होते हुए भी साहित्य के गूढ़ रहस्यों को समझता है । साहित्य का विद्यार्थी होते हुए भी विज्ञान के सिद्धान्तों को समझ लेता है ।

वस्तुतः प्रतिभा, मनुष्य के जिज्ञासु स्वभाव, तर्कशील प्रवृत्ति, विभिन्न मत-मतान्तरों और विषयों की जानकारी, मनुष्य के अपने अनुभवों और उसकी संवेदनशीलता का परिणाम होती है । यदि हमारी शिक्षा मनुष्य में ये गुण उत्पन्न कर सकती है तो हमारे समाज में विद्वानों की कमी नहीं रह सकती और मत-मतान्तरों से उत्पन्न भ्रान्तियाँ भी नहीं रह सकतीं । क्योंकि विद्वत्ता भ्रान्तियों की विध्वंसक होती है । सन्तों की भाषा में कहें तो कह सकते हैं कि ज्ञान का प्रकाश आते ही माया का अन्धकार नष्ट हो जाता है । किन्तु प्रतिभा के निर्मायक तत्त्वों को विकसित करने वाली यह शिक्षा बड़े-बड़े ऊँची फ़ीस बसूलने वाले महाविद्यालयों में नहीं मिल सकती । यह शिक्षा मनुष्य को मिल सकती है उसके परिवार से, उसके आसपास के लोगों से, उसकी विषम परिस्थितियों से । मनुष्य इन सब से सीखता है । इन स्थानों से यह शिक्षा मनुष्य को जन्म से ही मिलने लगती है । क्योंकि जन्म से ही मनुष्य में अनन्त जिज्ञासाएँ होती हैं । उम्र के साथ वे प्रायः कम होने लगती हैं । लेकिन जिन बच्चों के परिवार और आसपास का वातावरण तर्काश्रित होता है, उनकी जिज्ञासाएँ आधे-अधूरे उत्तरों से शान्त नहीं हो जातीं, उनकी जिज्ञासा या ज्ञान पिपासा कभी शान्त नहीं होती । ऐसा बच्चा ’मैं जानता हूँ’ या ’जान गया हूँ’, का भ्रम नहीं पालता । जिस बच्चे को अपने परिवार और अपने आस-पास संवेदनशील वातावरण मिलता है, उनकी संवेदनशीलता भी बढ़ती ही जाती है । यहाँ ध्यान रहे संवेदनशीलता, भावुकता से एकदम भिन्न होती है । संवेदनशीलता का अर्थ है अनुभव या महसूस करने की क्षमता । संवेदनशील व्यक्ति बाह्य जगत को अपने भीतर अनुभव करता है । किन्तु भावुक व्यक्ति अपने को बाह्य जगत में अनुभव करता है । पहले की दृष्टि बाहर से भीतर की ओर जाती है और दूसरे की भीतर से बाहर की ओर जाती है । इसीलिये भारतीय आचार्यों ने प्रतिभा  के दो भेद स्वीकार किये हैं । पहला, भावयित्री प्रतिभा और दूसरा, करयित्री प्रतिभा ।

भावयित्री प्रतिभा उसकी संवेदन शक्ति से विकसित होती है । इसी के द्वारा वह हर कथन, हर विचार, हर परिस्थिति और हर जानकारी को अपने भीतर अनुभव करता है । कारयित्री प्रतिभा के द्वारा वह उनमें वैचारिक और भावात्मक सामञ्जस्य स्थापित करता है और एक ऐसा मार्ग, एक ऐसा गवाक्ष खोलता है, जिस पर सभी चल सकते हैं, सभी उसमें से दुनिया को देख सकते हैं । जिस मार्ग पर चलने से श्रेय और प्रेय दोनों की प्राप्ति होती है । उसे दोनों के लिये अलग-अलग मार्ग नहीं खोजने पड़ते हैं । उसका एक ही मार्ग दोनों तक ले जाता है । उसके द्वारा खोले गये गवाक्ष में से पूरी दुनिया एक साथ देखी जा सकती है । उसे पूरी दुनिया को अलग-अलग गवाक्षों में से टुकड़े-टुकड़े करके देखने की आवश्यकता नहीं रहती । उसकी दृष्टि समग्र दृष्टि होती है ।

वह व्यक्ति फिर वह नहीं रहता शुद्ध चित्त बन जाता है, जहाँ केवल स्वयंप्रकाश ज्ञान होता है । जो व्यक्ति किसी विषय विषेष में विशेषज्ञता प्राप्त करने के फेर में पड़ा होता है, वह प्रतिभावान नहीं होता । और जो प्रतिभावान होता है वह किसी भी विषय की विषेषज्ञता के फेर में नहीं पड़ता । उसे जब जिस विषय की गूढ़तम बातें जाननी होती हैं, तभी वह उन्हें जान जाता है । ऐसे ही व्यक्ति नये-नये क्षितिज खोलने में समर्थ होते हैं । वही वास्तविक ज्ञानी हैं, वही वास्तविक विद्वान हैं । उनका ज्ञान ही वेद है ।  

December 11, 2017

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