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धर्म और रिलीजन

Religion

बचपन से ही मेरे मन में घुमड़ने वाली बहुत सी समस्याओं में से एक धर्म भी है । बचपन में मैं भी धर्म का अर्थ रिलीजन ही समझता था और यही स्कूल में पढ़ाया भी गया था । मगर मैं अपने पिताजी को अक्सर कहते हुए सुनता था-

जब से रिलीजन का अर्थ धर्म कर दिया गया तब से एक नया धर्म चल गया है, जिसे लोग हिन्दू धर्म कहते है और वास्तविक धर्म क्षीण होता चला जा रहा है ।

मुझे उनकी बात बड़ी अटपटी लगती थी । मैं उनसे पूछता था क्या हिन्दू कोई धर्म नहीं है? तो वे कहते हरगिज़ नहीं । मैं तर्क करता कि फिर स्कूल के दाखिले के फ़ॉर्म में हमारा धर्म हिन्दू क्यों लिखा गया और हम अपने को हिन्दू क्यों कहते हैं ? वे कहते यही तो इस देश का दुर्भाग्य है कि समाज में ग़लतफ़हमियाँ फैलाई जा रही हैं और धर्म क्षीण हो रहा है । उनने बताया कि हमारे किसी भी पुराण, किसी वैदिक संहिता या किसी स्मृति में हिन्दू धर्म तो क्या हिन्दू शब्द तक का उल्लेख नहीं है । मेरे लिये उनकी कही गई बात बहुत बड़ी गुत्थी बन गयी जिसे सुलझाना उस समय मेरे बस की बात नहीं थी । मैंने न तो कोई स्मृति पढ़ी थी और नहीं कोई वैदिक संहिता या पुराण ही पढ़े थी । मैं उनकी बात पर अविश्वास भी नहीं कर सकता था क्यों कि उनके ज्ञान पर मुझे भरोसा था । बड़े-बड़े पण्डित और महात्मा उनके ज्ञान का लोहा मानते थे । भले ही वे हिन्दी की दर्जा चार क्लास तक ही पढ़े थे । फिर भी उनकी बातों में दम होता था । बहुत से लोग उनसे चर्चा करने आते थे । मेरी बुद्धि सोचती कि इस समस्या को सुलझाना तो बहुत जरूरी है । अन्यथा सब लोग धर्म भ्रष्ट हो जाँयगें और समाज नष्ट हो जायगा । मैं बड़ा होता गया और इस समस्या को लगभग भूल सा गया । मग़र जब में आठवीं कक्षा में आया तो सामान्य विज्ञान की पुस्तक में पढ़ा कि प्रत्येक पदार्थ के कुछ गुण और धर्म होते हैं । उन गुण और धर्मों से ही उस पदार्थ की पहचान होती है । पदार्थ किसी भी रूप में परिवर्तित क्यों न हो जाय, उसके गुण और धर्म नष्ट नहीं होते । यहाँ धर्म शब्द को पढ़ कर मेरी भूली बिसरी समस्या फिर लौट आयी । मैं पशोपेश में पड़ गया कि जब किसी भी स्थिति में पदार्थ के गुण धर्म नष्ट नहीं होते तो मुसलमान के हाथ की रोटी खा कर हिन्दू का धर्म कैसे नष्ट हो जाता है या मूर्ति पूजा करके किसी मुसलमान का धर्म कैसे कुफ़्र हो जाता है । जरूर कुछ गड़बड़ है । या तो विज्ञान की पुस्तक में गलत लिखा है या हमारी धर्म सम्बन्धी अवधारणा ग़लत है । मैंने वहाँ धर्म के लिये अंग्रेजी शब्द देखा तो वहाँ रिलीजन नहीं था वहाँ धर्म के लिये जो शब्द मिला वह ’प्रौपर्टीज़’ (properties) था । मैं फिर हैरान हो गया कि धर्म के माने प्रौपर्टीज़ है या रिलीजन ? मुझे लगा कोई बड़ा घपला है । जिसे मैं नहीं समझ पा रहा हूँ । आसान सा एक समाधान दिमाग़ में आया कि विज्ञान में धर्म का अर्थ प्रपर्टीज़ होगा और समाज में रिलीजन, और मन उस समय शान्त हो गया ।

धीरे-धीरे मैं और बड़ा होता गया । पिताजी ने मुझे लघुसिद्धान्त कौमुदी पढ़ाई । इण्टरमीडिएट में फ़ेल होने पर मैंने साइंस छोड़ कर आट्‌र्स में इण्टर किया । यहाँ भी संस्कृत विषय लिया और यहाँ व्याकरण में शब्द सिद्धि पढ़ाई गई तो पता चला कि धर्म शब्द ’धृ’ धारणे ( धारण करने के अर्थ में) से बना है । तो ये समझ में आया कि धर्म वो है जो धारण किया जाता है । और जैसे पदार्थ अपने धर्म को धारण किये रहता है उसी तरह मनुष्य अपने धर्म को धारण किये रहता है । अतः यह धारणा और पुष्ट हुई कि पदार्थों के संदर्भ में धर्म प्रौपर्टीज़ है तथा मनुष्य के संदर्भ में वह रिलीजन है । क्योंकि रिलीजन भी मनुष्य के द्वारा धारण किया जाता है । फिर कहीं पढ़ा-

धारणाद्धर्म इत्याहू, तस्माद्धारयते प्रजा ।

धारणा और पुष्ट हो गई । बात खत्म हो गई ।

जब में बी.ए. में था तो कहीं पढ़ा- धर्मोरक्षति रक्षितः (जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है ) फिर समस्या खड़ी हो गई । हम रिलीजन की रक्षा करते हैं या कर सकते हैं किन्तु रिलीजन हमारी रक्षा कैसे करेगा ? तो फिर मन ने समझाया कि धर्म रक्षा करता है का अर्थ है उस धार्मिक समुदाय के लोग रक्षा करेंगें । यहाँ फिर समस्या का समाधान हुआ सा लगा । लेकिन पिताजी की बात अब भी मन के किसी कौने में दुबकी बैठी थी । फिर गर्मी की छुट्टियों में एक-एक कर पुराणों को पढ़ने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ । तो समस्या फिर खड़ी हो गई । पिताजी की बात याद आई कि जिस हिन्दू धर्म की बात की जाती है उस हिन्दू का नाम तो इनमें कहीं नहीं है । फिर ये हिन्दू कहाँ से आया? उन्ही दिनों कहीं यह भी पढ़ा कि इस्लाम के प्रवर्तक मुहम्मद साहब थे । तो सबाल उठा कि जब धर्म का कोई प्रवर्तक होता है तो जब तक कोई प्रवर्तक नहीं था तो धर्म कहाँ था? पुराणों के अधार पर ईश्वर स्मरण, पूजा-पाठ आदि को मैं धर्म या रिलीजन समझ रहा था उसका तो कोई प्रवर्तक उन पुराणों में देखने को नहीं मिला । फिर बिना किसी प्रवर्तक के हमारा धर्म जिसे हिन्दू धर्म कहते हैं कहाँ से आया? तभी किसी ने बताया कि ये हिन्दू धर्म शब्द गलत है इसके स्थान पर सनातन धर्म शब्द होना चाहिये । बात सही लगी क्यों कि भाषा विज्ञान की प्रारम्भिक पुस्तकों में पढ़ा था कि हिन्दू शब्द पर्शियन भाषा का है, जिसका अर्थ होता है-हिन्दुस्तान का रहने वाला यानी भारतीय या इण्डियन । सब जानते हैं कि भारतीय या इण्डियन नेशनेलिटी, नागरिकता है, धर्म नहीं । इण्डियन नेशनेलिटी में तो अनेक रिलीज़न हैं, जैसे शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन, वैष्णव या सिख आदि । अतः लगा कि पिताजी जब हिन्दू को धर्म नहीं मानते थे तो वे ठीक थे । पिताजी पर मेरी आस्था और बढ़ गई । लेकिन अब एक नया प्रश्न पैदा हो गया कि यदि हिन्दू धर्म ही नहीं है तो फिर हमारा धर्म क्या है? दिमाग़ के किसी कोने से किसी का बताया हुआ उत्तर मिला कि सनातन धर्म । और किसी ने मुझे बता दिया कि सनातन धर्म माने सबसे प्राचीन धर्म । मुझे लगा कि पिताजी की बात आंशिक सत्य थी । हिन्दू धर्म नहीं है ये सत्य है किन्तु वे धर्म को रिलीजन भी नहीं मानते थे । शायद ये बात उनकी गलत थी । मेरा मन कहता था कि नहीं पिताजी गलत नहीं हो सकते ।

अब हिन्दू की समस्या तो सुलझ गई मगर धर्म की समस्या वहीं की वहीं थी कि धर्म रिलीजन है या नहीं? उन दिनों हमारे जिले अलीगढ़ में हिन्दू मुस्लिम दंगे बहुत होते थे । सहपाठियों के साथ धर्म को लेकर बड़ी गर्मागरम बहसें होतीं थीं । मैं भी अपनी समझ के अनुसार उन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता था । तभी एक कम्युनिस्ट मित्र ने बहस के दौरान मेरा ज्ञान वर्धन किया कि कार्ल मार्क्स के अनुसार सभी धर्म अफ़ीम के नशे जैसे हैं । जो धीरे-धीरे मनुष्य को नष्ट कर रहे हैं । इस बात से एक तरफ़ तो मेरे ज्ञान चक्षु खुल गये और दूसरी ओर मेरा ब्रह्माण्ड हिल गया । मेरी यह धारणा टूट कर बिखरने लगी कि जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है । मैं पण्डितों और धर्म-प्रचारकों से भिड़ने लगा । उन में कुछ तो मुझ से नाराज़ हो गये और मुझे नास्तिक कहने लगे । कुछ मुझे तरह-तरह के तर्कों से समझाने की कोशिश करने लगे । लेकिन मेरी समझ में उस समय किसी की बात नहीं आती थी क्यों कि मैं देख रहा था धर्म के नाम पर लोग मर रहे थे । मुझे धर्म रक्षक नहीं, भक्षक लगने लगा । मैं अपने भाषा ज्ञान के आधार पर, मुझे नास्तिक कहने वालों को बताता कि जिस तरह आस्तिक का अर्थ धर्म को मानने वाल नहीं है उसी प्रकार नास्तिक अर्थ धर्म को न मानने वाला भी नहीं है । आस्तिक का अर्थ है जो संभावनाओं को स्वीकारता है, और नास्तिक का अर्थ है, जो संभावनाओं को नहीं स्वीकारता । आस्तिक शब्द संस्कृत के अस्ति से बना है जिसका अर्थ होता ‘है’ है । अर्थात् हम जो जानते हैं उसके आगे भी कुछ है या हो सकता है, यह मानने वाला आस्तिक है और जो हमारी जानकारी के आगे भी कुछ है, इस बात को नहीं मानता वह नास्तिक है । इसमें धर्म कहाँ से आ गया? जो मानता है ‘सितारों के आगे जहाँ और भी हैं’, वही आस्तिक है । आप अपने धर्म से आगे देखिये तो पाएँगें कि धर्म के आगे और बहुत कुछ है । मैं उस और बहुत कुछ को देखता हूँ, मैं आस्तिक हूँ । आप नहीं देखते आप नास्तिक हैं ।

जो भी हो इन ज्वलन्त तर्कणाओं ने मेरे भीतर का समुद्र मंथन फिर से प्रारम्भ करा दिया कि आखिर धर्म क्या है? क्या रिलीजन या मज़हब को धर्म कह सकते हैं । मुझे लगता कि रिलीजन या मजहब तो शासकों की फूट डालो और शासन करो की नीति का एक अस्त्र है । मुझे मालूम था कि –मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना । हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्ताँ हमारा कहने वाले मशहूर शायर इक़बाल भी बँटवारे के बाद अपना हिन्दोस्ताँ छोड़ कर पाकिस्तान तशरीफ़ ले गये थे । मेरा मन कहता हमार धर्म ऐसा नहीं हो सकता । मुझे लगता कि धर्म कोई और चीज़ है और रिलीजन या मज़हब कोई और चीज़ । धर्म शब्द हमारी भाषा का है शायद इसलिये मेरी उस पर ममता थी, जो मैं उसे रिलीजन या मज़हब मानना नहीं चाहता था । फिर ऐसा न मानने से पिताजी की इस बात की रक्षा भी होती लगती थी कि धर्म का अर्थ रिलीजन या मज़हब नहीं है । इसलिये मैं ये मानना चाहता था कि धर्म का अर्थ मज़हब या रिलीजन नहीं है । संस्कृत और हिन्दी में रिलीज़न के लिये दूसरे दो दो शब्द मिले सम्प्रदाय और पंथ । ये अनुवाद मुझे सही लगे । क्यों कि रिलीज़न, सम्प्रदाय या पंथ एक विश्वास, एक आस्था या एक मान्यता होती है । प्रत्येक रिलीज़न या सम्प्रदाय एक ईश्वर, एक पुस्तक तथा एक पूजा पद्धति में विश्वास या आस्था रखता है । मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि सभी सम्प्रदायों में ये बात देखी जा सकती है । किन्तु तथाकथित हिन्दू मज़हब या रिलीज़न में ऐसा नहीं है । वहाँ अनेक ईश्वर, अनेक देवता, अनेक ग्रंथ और बहुत सी पूजा पद्धतियाँ हैं । फिर हिन्दू रिलीज़न कैसे हो सकता है । निश्चय ही हिन्दू कोई रिलीज़न या मज़हब नहीं है और न ही हिन्दू कोई धर्म है । क्यों कि वह किसी भी मनुष्य की प्रौपर्टी नहीं है । अब मैं अपने अन्दर स्पष्ट था कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है, हिन्दू कोई रिलीज़न, मज़हब या सम्प्रदाय भी नहीं है । हिन्दू एक nationality(नागरिकता) है, भारतीय नागरिकता या Indian nationality। एक ही राष्ट्र के विभिन्न नागरिक विभिन्न पंथों में आस्था रख सकते हैं या एक साथ बहुत से पंथों में भी । तथा कथित हिन्दू धर्म शैव, शाक्त, वैष्णव आदि विभिन्न पंथों की खिचड़ी है । मेरी बुद्धि यह भी जान चुकी थी कि धर्म का अर्थ रिलीज़न नहीं अपितु प्रौपर्टीज़ है । गांधी जी की हत्या के उपरान्त हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाने के पीछे कांग्रेस का जो भी राजनैतिक स्वार्थ रहा हो । कांग्रेस ने इन दोनों को मुस्लिम विरोधी और हिन्दूवादी कह कर हिन्दू को एक धर्म के रूप में प्रचारित किया था । मेरी धारणा है कि तभी से भारत वर्ष में हिन्दू को नैशनेलिटी के स्थान पर रिलीज़न की मान्यता प्राप्त हो गई । यह आश्चर्य की बात है कि जो प्रो. हेडगेवार और गुरु गोलवलकर हिन्दू को रिलीजन नहीं राष्ट्रीयता मानते थे तथा धर्म को भी रिलीजन से भिन्न मानते थे, उनके वर्तमान अनुयायी आजकल हिन्दू को धर्म और धर्म को रिलीजन मानने लगे हैं ।

अब तक मेरी चेतना ने भाषा की समझ के साथ-साथ बहुत से शब्दों के मूल अर्थ जान लिये थे । मेरी समझ में जिस सनातन शब्द का अर्थ, सामान्य जनों से सुनी हुई बातों के आधार पर बहुत प्राचीन था । उसका अर्थ अब मेरे सामने स्पष्ट है

सन = तपस्या, आतन = आया हुआ या निकला हुआ ।

तपस्या से निकला हुआ या तपस्या अर्थात् भारी मनन-चिन्तन के परिणाम स्वरूप प्राप्त । अब मैं पूरी तरह स्पष्ट हूँ कि धर्म का अर्थ प्रौपर्टीज़ ही है । सनातन धर्म का अर्थ है मनुष्य मात्र में समान रूप से पाई जाने वाली प्रौपर्टीज़ जो भारतीय ऋषियों के द्वारा भारी मनन-चिन्तन के बाद निकाली गईं या जानी गईं । मनुष्य मात्र की ये प्रौपर्टीज़ प्रत्येक परिस्थिति में प्रत्येक मनुष्य में समान रूप से पाई जाती हैं । जिस प्रकार ताप अग्नि का धर्म (प्रौपर्टी) है उसी प्रकार मनुष्य के भी कुछ धर्म हैं । जिस प्रकार ताप को अग्नि से पृथक् नहीं किया जा सकता उसी प्रकार मनुष्य के धर्म को भी मनुष्य से अलग नहीं किया जा सकता । जैसे ताप के नष्ट होने के साथ ही साथ अग्नि नष्ट हो जाती है । उसी प्रकार धर्म के नष्ट होते ही मनुष्य नष्ट हो जायगा । इसीलिये कहा गया धर्मोरक्षति रक्षितः

अब प्रश्न है कि वह धर्म वस्तुतः क्या है जिसे मनुष्य मात्र धारण किये हुए है ? मैं सोचता हूँ प्रत्येक मनुष्य शरीर धारण किये हुए है । इसलिये शरीर मनुष्य मात्र का धर्म है । बिना शरीर के मनुष्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती । शरीर है तो मनुष्य है । मनुष्य है तो शरीर है । धर्म और धर्मी को अलग नहीं किया जा सकता क्यों कि एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं हो सकता । अतः शरीर ही धर्म है । भारतीय दर्शनों के अनुसार प्रत्येक मनुष्य तीन प्रकार के शरीर धारण किये हुए है-

  1. कारण शरीर या लिङ्ग शरीर
  2. सूक्ष्म शरीर
  3. स्थूल शरीर

इनमें चित्त और अहंकार ही कारण शरीर है । मन और बुद्धि ही सूक्ष्म शरीर है और पंच तत्वों से निर्मित स्थूल शरीर तो सर्वदृश्य है । ध्यान रहे इनमें क्रमशः एक से एक स्थूल है । प्रत्येक स्थूल को उससे जो सूक्ष्म है, वह चलाता है । अतः चित्त और अहंकार, जो सर्वाधिक सूक्ष्म हैं, दोनों (सूक्ष्म और स्थूल शरीर) की गति के मूल कारण होने से कारण शरीर कहे जाते हैं । चूंकि मन और बुद्धि अदृश्य हैं और पंचभौतिक शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म हैं अस्तु सूक्ष्म शरीर कहे जाते हैं । वस्तुतः ये तीन शरीर ही मनुष्य मात्र के धर्म हैं जिन्हैं वह धारण करता है । यही मानव की प्रौपर्टीज़ हैं । इसीलिये संस्कृत में कहावत है- शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम् और हिन्दी में भी- काया राखै धरम है । इनकी रक्षा करने से ही मनुष्य की रक्षा होती है । इनके नष्ट होते ही मनुष्य की सत्ता नष्ट हो जाती है । इसलिये मनुष्य को प्रयत्न पूर्वक इनकी रक्षा करनी चाहिये । किन्तु खेद का विषय है कि आजकल स्थूल शरीर की रक्षा करने के लिये सभी समाज प्रयत्न शील हैं । किन्तु शेष दोनों शरीरों (कारण और सूक्ष्म शरीर) की रक्षा करने के लिये वैसे प्रयत्न नहीं दिखाई दे रहे । जैसे स्थूल शरीर की रक्षा का भार समाज में डॉक्टर और वैद्य उठाते हैं । उसी प्रकार शेष दोनों शरीरों की रक्षा के लिये सभी समाजों में दार्शनिक, वैज्ञानिक, पण्डित और संत-महात्मा प्रवृत्त रहते हैं । इसी रक्षा के क्रम में समय-समय पर पण्डित और साधु-संत समाज में मनुष्य की मन और बुद्धि को शुद्ध एवं पुष्ट रखने के लिये सत्संग आदि के द्वारा दिशा-निर्देश करते रहते हैं । दार्शनिक और पण्डित विधि-निषेध और नीतियों का निर्धारण करते रहते हैं । भारत में विभिन्न स्मृतियाँ अलग-अलग कालों में लिखी गईं और सभी में अन्तर भी है । इससे स्पष्ट है कि देश, काल और परिस्थियों के अनुरूप इनमें परिवर्तन होता रहा है । एक ही बायलौज हमेशा नहीं चलता रह सकता । समय-समय पर उसमें संशोधन-परिवर्धन होते रहते हैं और होते रहे हैं । जिस समाज में इन तीनों शरीरों की रक्षा का प्रबन्ध नहीं होता अथवा इनकी रक्षा की व्यवस्था शिथिल होती है वही समाज नष्ट हो जाता है या पतनोन्मुख हो जाता है । इसी धर्म-रक्षा की तकनीक विकसित करने के क्रम में विभिन्न समाजों में ज्योतिष, आयुर्वेद, चिकित्सा (Medical Science) आदि ज्ञान की दिशाओं के साथ-साथ अनेक आस्था-केन्द्रों का और विभिन्न पूजा-पद्धतियों अर्थात् संप्रदायों (रिलीजंस) का भी विकास हुआ । रिलीजन धर्म की रक्षा के लिये होते हैं, रिलीजन धर्म नहीं हैं । किन्तु यह देख कर बड़ा दुःख होता है कि एक लम्बे समय से इन का राजनीति करण होने लगा है इतना ही नहीं इस उपभोक्ता संस्कृति के युग में धनार्जन के साथ अन्य स्वार्थों के लिये भी इनका दुरुपयोग होने लगा है । फलतः नित नए संप्रदाय और पंथ खड़े हो रहे हैं । यहाँ तक कि चिकित्सा आदि का भी व्यवसायीकरण होने लगा है । यही हाल शिक्षा का भी है । मनुष्य के मन और बुद्धि को स्वस्थ रखने की बजाय उसे बंधक बना कर अस्वस्थ किया जा रहा है ।

हमारे भारत वर्ष में धर्म, विशेषकर कारण और सूक्ष्म शरीर को समझने और समझाने की दिशा में अनगिनत कार्य हुए हैं । हमारे यहाँ धर्म के संबंध में जो कहा गया है-

धृतिक्षमादमोस्तेयंशौचमिन्द्रिय निग्रहः । धीर्विद्यासत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ॥ 2

वह धर्म नहीं बल्कि तीनों में से एक धर्म, कारण शरीर (अहंकार और चित्त) के लक्षण या पहचान हैं जिनसे चित्त का पता लगता है । यही मनुष्य के गुण भी हैं । क्योंकि धर्म के साथ कुछ गुण भी रहते हैं जिनसे धर्म और धर्मी की पहचान होती है ।

  1. धृति (धैर्य या Patience)
  2. क्षमा (माफ़ करना या To Ignore)
  3. दम (रोकना, दमन करना, Holding On)
  4. आस्तेय (कुछ न छिपाना यानी बाहर-भीतर से एक से रहना)
  5. शौच (पवित्रता, सफ़ाई (बाहर की भी और भीतर की भी))
  6. इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों पर नियन्त्रण)
  7. धी (समझ या Cognizance)
  8. विद्या (जानकारी, Knowledge)
  9. सत्य ( तथ्यों में से निष्कर्ष निकालने की प्रवृत्ति
  10. अक्रोध (क्रोध न करना )

ये प्रथम धर्म (अहंकार और चित्त) के लक्षण हैं, कोई नीति या ethics नहीं हैं या ऊपर से किसी के द्वारा थोपे गये नियम नहीं हैं । ये सभी मनुष्यों में थोड़े या बहुत होते ही हैं । हमारे ऋषियों ने बड़े तप के बाद इन्हें जाना है । यही सनातन हैं । जैसे सभी पदार्थों के कुछ गुण और धर्म होते हैं उसी प्रकार मानव के ये दश गुण और तीन धर्म होते हैं । गुणों के विलोम दोष होते हैं यानी अधैर्य, क्षमा हीनता आदि दोष हैं ।

यदि यहाँ संस्कृति की बात न की तो हम समझते हैं कि यह धर्म चर्चा अधूरी ही रह जायगी । यद्यपि धर्म और संस्कृति विद्वानों की दृष्टि में अलग-अलग बातें हैं तथापि तथाकथित पण्डितों की कृपा से आम आदमी की दृष्टि में धर्म और रिलीजन के साथ-साथ संस्कृति भी गड्डमगड्ड हो गई है । धर्म और रिलीजन की ही तरह संस्कृति और कल्चर भी मुझे परेशान करते रहे हैं । मेरी समझ में संस्कृति और culture दोनों ही अलग-अलग अर्थ बोध देते हैं । संस्कृति ’संस्कार’ से और कल्चर cult से बना है । संस्कार शब्द ज्योतिष, गणित और आयुर्वेद आदि में संशोधन (correction) के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है । धर्म के साथ मनुष्य में रहने वाले गुणों में समय-समय पर जो संशोधन होते रहे हैं, वे संस्कार कहे जाते हैं । अतः संस्कृति मनुष्य के संस्कारों की शृंखला का नाम है । जो सदैव सभ्यता में परिलक्षित होती है । इस बात को काव्यात्मक भाषा में कहें तो कह सकते हैं कि संस्कृति किसी समाज के व्यक्तियों की आत्मा है तो सभ्यता उनका शरीर । संस्कृति और सभ्यता में वही अन्तर है जो अर्थ और शब्द में होता है । सभ्यता में संस्कृति अभिव्यक्त होती है । संस्कृति शब्द संस्कार से बना है । भूख और तृप्ति, सुख-दुःख, सुन्दर-असुन्दर, अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य, अपना-पराया, भेद-अभेद आदि कुछ ऐसे संस्कार हैं जो मानव-चित्त में अनेक जीवन यात्राओं के बाद एकत्रित हुए हैं । ये सभी संस्कार जैसा कि स्पष्ट है जोड़ों (युग्म) में होते हैं । वास्तव में ये ही चित्त की विभिन्न वृत्तियाँ हैं जिन्हें बाह्य संसार के संसर्ग से मनुष्य अनुभव करता है । पूरे विश्व में ये लगभग समान हैं । इनमें स्थान, काल और व्यक्ति भेद से कुछ कम या बढ़ हो सकती है । कुछ हजार सालों से जबसे संप्रदायों का विकास हुआ है मनुष्य ने अपनी अहम्मन्यता के कारण इन युग्मों को तोड़ने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया है । अतः इनमें से भूख, असुन्दर, बुरा, पाप आदि कुछ विलोम संस्कारों का निषेध करने की प्रवृत्ति बढ़ने लगी । फलतः कुछ समझदार लोग मनुष्य को एक ख़ास ढाँचे में ढालने की कवायद में जुट गये । सबके साँचे अलग-अलग थे और हैं । यही कारण है कि अनेक सम्प्रदायों की ही तरह अलग-अलग विचारधाराओं के समूह (culture) बनने लगे । मनुष्य के बुद्धि और मन को अलग-अलग उद्देश्यों के लिये अलग- अलग तरीकों से cultivate किया जाने लगा । जिसे culture या religion का नाम मिला । अतः अनेक प्रकार के रिलीजन और कल्चर विकसित हो गए । वस्तुतः कल्चर और रिलीजन मनुष्य के मन और बुद्धि में किये जाने वाले संशोधन (करैक्शन) हैं जबकि धर्म और संस्कृति मनुष्य के चित्त और अहंकार के संस्कार (correction) हैं ।

वस्तुतः मानव संस्कृति सम्पूर्ण विश्व में एक ही है । स्थान, काल और व्यक्ति भेद से इनमें परिमाणात्मक अन्तर हो सकता है, गुणात्मक नहीं । इनकी अभिव्यक्ति भी इन तीन कारणों से भिन्न-भिन्न रूपों में होती है । जिन्हें हम सभ्यताएँ कहते हैं । जैसे भूख एक संस्कार है जो संस्कृति का ही एक अंग है । इसे तृप्त करने के लिये विभिन्न स्थानों, कालों एवं व्यक्तियों के तरीके अलग-अलग होते हैं जो धीरे धीरे परंपरा बन जाते हैं । जैसे भूख को शान्त करने के लिये चीनी कुछ अलग तरह के पदार्थ तैयार करते हैं और इटली के लोग कुछ अलग और भारत के लोग कुछ अलग इसी प्रकार विभिन्न देशों और प्रान्तों में भी । जैसे खाना बनाने के तरीके अलग-अलग होते हैं वैसे ही खाना खाने के तरीके भी अलग-अलग होते हैं । ये ही विभिन्न सभ्यताएँ हैं ।

भारत में अनेक सांस्कृतिक परंपराएँ हैं जिन्हें सभ्यता और शिष्टाचार भी कहते हैं जैसे- होली, दिवाली, रक्षाबंधन, दशहरा, विवाह, करवाचौथ आदि । होली, दिवाली और लोहड़ी वस्तुतः नई फ़सल के आने पर सामूहिक रूप से खुशी को व्यक्त करने के पर्व या त्यौहार हैं । किन्तु कालान्तर में होली और दीपावली को संप्रदायिक पूजा पद्धतियों (religion) से जोड़ दिया गया । हो सकता है इसके मूल में एक अच्छी परंपरा को बनाए रखने की भावना रही हो । किन्तु इसके सुपरिणाम नहीं हुए । जिस प्रकार भारत में जिस क्षेत्र का भी राष्ट्रीय करण हुआ उसी क्षेत्र में गुणवत्ता का ह्रास हो गया । उसी प्रकार सांस्कृतिक परंपराओं का सांप्रदायीकरण होते ही उनके भीतर की खुशी और मस्ती तथा सहजता ग़ायब हो गयी और रह गया केवल एक ritual । अब दिवाली पर आम आदमी में नए अन्न के आगमन की खुशी और मस्ती की सहजता के स्थान पर लक्ष्मी को खुश करने की होड़ और उस होड़ में पिसना तथा लक्ष्मी नाराज़ न हो जाँय इस भय से पूजा करना रह गया है । अब लक्ष्मी जी को खुश करने के लिये या उनके कोप से बचने के लिये एक पुजारी का होना आवश्यक हो गया । ताकि पूजा पद्धति में कोई गड़बड़ न हो जाय । अब दिवाली पुजारी जी के लिये व्यापार और आम आदमी के लिये एक बोझ या ritual मात्र है, जिससे वह लक्ष्मी को खुश करके धनवान हो जायगा । मस्ती और खुशी की जगह एक भ्रम ने ले ली कि पूजा करके धनवान बना जा सकता है । मैं पुरोहितों, पुजारियों और ज्योतिषियों के पास ऐसे लोगों की भीड़ देखता हूँ जो उन से कोई मन्त्र या पूजा-पाठ इसलिये जानना चाहते हैं कि वे शीघ्र धनवान बन जाँय । वे ये नहीं सोचते कि पूजा पाठ से यदि धनवान हो सकते होते तो फिर व्यापार और नौकरी की क्या आवश्यकता है । अब बस एक ही उद्योग रह गया है पूजा-पाठ उद्योग । पुजारियों, ज्योतिषियों ने मनुष्य के सूक्ष्म शरीर (मन और बुद्धि) को बंधक बना लिया है । इससे किस का लाभ हो रहा है । मनुष्य का तो धर्म नष्ट हो रहा है । किन्तु बंधक बने हुए मन-मस्तिष्क वाले ये लोग समझ रहे हैं कि वे बड़ा भारी धार्मिक और सांस्कृतिक कार्य करके पुण्य कमा रहे हैं । धर्म ये नहीं है, ये संस्कृति भी नहीं है । इन मठाधीशों के कारण सभी सांस्कृतिक पर्व और त्यौहार तथाकथित धार्मिक (सांप्रदायिक) हो गये हैं । अब उनका निर्णय भी वही करेंगें कि वे पर्व और त्यौहार कब और कैसे मनाए जाँयें । उसके लिये अपनी महत्ता प्रतिपादित करने वाले तथाकथित धर्मशास्त्रों की रचना कर दी गई । मजे की बात है उनमें एक रूपता का सर्वथा अभाव है । क्यों कि उनका उद्देश्य मनुष्य के धर्म को बचाना नहीं अपितु उसका दोहन करने के लिये उसके धर्म ( मन, बुद्धि, चित्त और शरीर ) को बंधक बनाना है । तथाकथित हिन्दुओं में देखें हर पर्व, त्यौहार और उत्सव दो हो गये हैं और जिनमें ऐसा नहीं हुआ है उनमें अपना महत्त्व प्रतिपादित करने के लिये उन्हैं दो फाड़ किया जा रहा है । इन धर्मध्वजों की कृपा से प्रदर्शन और पाखण्ड तो बढ़े हैं किन्तु पर्वों त्यौहारों और पूजा-पाठ के भीतर की आत्मा, उनके पीछे की भावना मर गई है या मरती जा रही है । मुझे अच्छी तरह याद है तथाकथित पण्डितों की अहम्मन्यता के कारण सम्वत् २०३९ तदनुसार सन् १९८२ में आधे भारत में दिवाली अक्टूबर में तथा आधे भारत में नवम्बर में मनाई गई थी और इस कृत्य में बनारस के एक काँग्रेसी राजनेता की भूमिका जागरूक लोगों से छिपी नहीं थी ।

जो भी हो आज आवश्यकता है इन शब्दों के सही अर्थों को समझने की । सही अर्थों को समझने के बाद ही किसी भी प्रकार के वैचारिक घालमेल से बचा जा सकता है । अन्यथा वैचारिक घालमेल भविष्य में मनुष्य को एक ऐसी वैचारिक अराजकता में ले जायगा जिसमें विचारों की आपसी मारकाट मनुष्य की बुद्धि को कुण्ठित अस्तु नष्ट करके उसे पागल बना देगी।

  1. पण्डा शब्द का अर्थ सदसद् विवेकनी बुद्धि है और पण्डित का अर्थ है जिसके पास यह बुद्धि हो, वह व्यक्ति। पण्डित का अर्थ कोई पूजा पाठ कराने वाला व्यक्ति नहीं है ।
  2. मनुस्मृति : ६/९२ ।
  3. संस्कार इतने ही नहीं हैं । इनकी संख्या बहुत है । ये वे प्रोग्राम्स हैं जो चित्त रूपी कम्यूटर में भरे पड़े हैं । इन्ही की सहायता से मनुष्य दुनिया के तमाशे को रीड कर पाता है और हमें दिखाता है ।
December 11, 2017

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