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डा० श्रीमोहन प्रदीप

संकल्प और विकल्प,स्मृतियाँ और विस्मृतियाँ -इसी का नाम तो मन है।
किन्तु कुछ संकल्प और स्मृतियाँ मनौमण्डल में बादल और बिजली की
तरह खेल खेला करती हैं। ये हृदयाकाश में अपनी चमक भरती हैं और
लोचनों में आर्द्रता भी ले आती हैं। ऐसी ही स्मृतियों में डा0अशोक शर्मा
की स्मृति है जो जीवन भर अपना स्थान बनायें रखेगी।वे मेरे विद्यार्थी भी
रहे और फिर उच्च अध्ययन के लिए शाहागाद विश्वविद्यालय चले गये।
वैसे वे अपनी किशोरावस्था से हीं मेरे परिचय की परिधि में आ गये
हाथरस में एक जैन मुनि के मानवत्तावादी तथा अहिंसक विचारों के प्र-
चार-प्रसार हेतु एक संस्था ‘राजचन्द्र मिशन’का गठन किया गया था
णिसकी साप्ताहिक बैठकें लोहिया धर्मशाला डिब्ागली में होती थीं।
इस मिशन के तीन संस्थापक सदस्य थे, जिनमें अशोक जी के पिताश्री
पंडित बैजनाथ शर्मा,ज्योतिषविद्‌ (अध्यक्ष),दाल व्यापारी श्री हजारी
मल वॉठिया तथा स्वयं इन पंक्तियों का लेखक दो अन्य सदस्य रहे |
कदाचित्‌ अशोक जी के पिताश्री ने इनका भविष्य जान लिया था इस-
लिए उन्होंने मुझसे कहा कि अशोक से क॒छ लेखन कार्य कराइए |
मैं उन्त दिनों काशीनागरी-प्रचारिणी समा वाराणसी से प्रकाशित
‘कबीर साखियाँ’की टीका लिख रहा था। इस पुस्तक का कुछ भाग
मैंने उन्हें लिखने को दिया तो जो उन्होंने लिखा उसे पढ़कर मैं प्रमा-
वित हुआ और इनकी प्रतिमा से भी परिचित हुआ। इस पुस्तक की
भूमिका में मैंने इनके विषय में लिखते हुए कहा था कि इनका भविष्य
उज्ज्वल है और इनमें महत्त्वपूर्ण लेखकीय प्रतिमा विद्यमान है |जंब
अशोक जी अपनी प्रथम कनाडा की यात्रा से लौटे थे और उनका
पहला सम्मान समारोह हुआ था उसमें मैंने यह चर्चा की थी। मैंने यह
भी कहा था कि मैं उनकी तरह ज्योत्तिष का ज्ञानी तो नहीं हूँ किन्तु
मेदी भविष्यवाणी सही सिद्ध हो गयी है।आज मुझे उनके नाम के साथ
अशोक का वृक्ष स्मरण आ रहा है| देखा गया है कि वह सदै हरा –
भरा दृष्टिगोचर होता है | पतझड़ में भी वह कभी नग्न नहीं होता
उसका एक पीला पत्ता तब गिरता है जब दूसरा पूरा हरा फ्ता आ-
कर इसे ढक लेता हैं। कदाचित्‌ इसी सदाबहार हरेपन के कारण
लंका मेंसीताजी को अशोक वाटिका में रखा गया था ताकि उनके
समक्ष सदैव हरीतिमा बनी रहे | डाए अशोक शर्मा की स्मृति भी
मेरे जीवन में बराबर हरी-मरी बनी हुयी है और आजीवन बनी
रहेगी।वास्तव में अशोक अशोक थे,दूसरों को शोक भले दें गये हों।

छपते -छपते :
“प्राच्य मंजूषा’ विशेषांक के छप॑ते-छपते डा. श्रीमोहन प्रदीप 9
सित्तम्बर 2043 को स्वर्गवासी हो गए। डा. प्रदीप जी “प्राच्य
मंजूषा” के सम्माननीय संरक्षक थे | पत्रिका – परिवार उनके
निघन पर शोक व्यक्त करता है। साथ ही उनकी आत्मा की शांति
हेतु परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करता है।
सम्पादक

June 24, 2022

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