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डा० वेदप्रकाश अभिताम

वे कहा करते थे और बार-बार कहते थे -‘चलो बन्धु चलें,”इस बदमिजाज
मौसम की छात्ती पर बैठें और मूँग दलें।’ फिर न जाने क्या सोचा उन्‍होंने,
अकेले ही चले गए मौसम की बदमिजाजी औरबदतमीजी का प्रतिंकार
करने और उनके अनेक बन्धु यहीं ठगे से खड़े रह गए।वे मनमौजी थे और
अपनी शर्तों पर जीने वाले भी |लेकिन इस निष्ठुरता की कल्पना नहीं की
थी।लग- भग चालीस वर्षों का लम्बा साथ रहा है मेश और अशोक शर्मा
का। कितनी सरस्त और आत्मीय यात्राएँ साथ कीं, कितनी संगोष्ठियों में
साथ-साथ भाग लिया। जहाँ गए वहीं वे अपने पांडित्य और वाग्मिता की
धाक जमा करलौटे। चाहे मूगोल विषय की सेमिनार हो या ज्योतिष का
मुद्‌दा हो, साहित्यिक गुत्थियाँ हो या सामांजिक–सांस्कृतिक विसं-
गतियाँ -सब पर वे समान अधिकार से बोल सकते थे। और यह बोलना
चर्वित चर्वण नहीं होता था, उनके अपने सोच से अनुशासित और समृद्ध
होता था। अभी तो बहुत सारी योजनाएँ थीं उनके मस्तिष्क में, बहुत से
संकल्प थे, अनेक सपने थे। सब अधूरे रह गए। आयुर्वेद,ज्योतिष और
भारतीय काव्यशास्त्र पर उन्होंने अखिल भारतीय सम्मेलन कुशलता-
पूर्वक आयोजित किए थे। एक अकेले व्यक्ति मैं कितनी प्रतिमा, कितनी
ऊर्जा, कितनी कर्मठता हो सकती है, वे इसके विरल उदाहरण थे।-
ज्योतिष पर ग्रन्थ लिख रहे हैं। नवगीत विधा को ताजे-डटके बिम्बों से
समृद्ध कर रहे हैं। शोधसंस्थान की स्थापना कर रहे हैं, कहीं भागवत
कथा के व्यास्धीठ पर विराज रहे हैं। ‘प्राच्यमंजूषा’ शोध- पत्रिका का
सम्पादन और प्रकाशन कर रहे हैं, शोध-निर्देशन कर रहे हैं,और वे
अध्यापक हैं ही। जब-तब विदेश यात्राएँ भी हो रही हैं।शायव इतना सब
करने के लिए एक जन्म पर्याप्त नहीं होता है।जिन्हें पुनर्जन्म में विश्वास है
,उन्हें लगता है कि अशोक अधूरे कामों को पूरा करने के लिए फिर
धरती पर आयेंगे |उन्होंने भी एक गीत में घोषणा की है – पुनः सगूँगा
क्रांतिदूत सा, एक तप्त सूरज बनकर के |” हाथरस में और अपने
परिचितों में वे अशोक पंडित के नाम से प्रसिद्ध थे। पंडित और ज्योतिषी
कहने पर किसी का जो बिम्ब बनता है वह बहुत रुढ़िवादी, कर्मकांड-
लिप्त और धर्म कौ व्यवसाय बनाने वाले व्यक्ति का होता है। अशोक
शर्मा आधुनिक बोध से सम्पन्न व्यक्तित्व थे | सोच, व्यवहार से लेकर
वेशभूषा तक में वे अन्य पंडितों से भिन्‍न थे। सूट पहन कर विवाह
पढ़ाने वाले पंडित को देखकर बच्चुत से लोग अचंमे में पड़ जाते थे |वे
ज्योतिष को विज्ञान मानते थे और उसका बहुत सावधानी और गम्भीरता
जे उपयोग करने के पक्षपाती थे। एक बाए मुझे पत्नी ने लेलठाल कर उन
के पास आर्थिक एवं स्वास्थ्यसम्बन्धी समस्याओं के संदर्भ में उनके पास
जन्मकुंडली लेकर भेजा था।जबउन्हें मेरे आने का कारण ज्ञात हुआ तो
पहले जोर से हैंसे थे,फिर कहीं से निकाल कर एक श्लोक दिखा दिया
था।उसका भावार्थ था कि जो पुरुषार्थी होते हैं,उनका आकाश के नक्षत्र
कुछ बना-बिगाड़ नहीं सकते|मैंने अपनी कुंडली जेब में रख ली थी।
अनेक पंडितों ने किसी के माँगलिक होने और किसी के कालसर्प योग
से पीड़ित होने का हउवा सा बना रखा है। अशोक शर्मा इस सम्बन्ध में
बहुत तार्किक और शास्त्रसम्मतत दृष्टिकोण रखते थे |भय औरश्रद्धा का
दोहन करके धन कमाने वालों से बहुत अलग तरह के ज्योतिषीथे।अपने
निधन से ठीक पहले तक वे खेरेश्वर धाम में ज्योतिषसम्बन्धी भ्रमों और
कढ़ियों के निवारण में जुटे हुए थे। उन्हें बहुत संवेदनशील कवि हृदय
मिला था। उनकी काव्य-कृतियाँ मनसंपाती’, सौंकले दूटी पड़ी हैं’,
“जवाहर ज्योति’और ‘अनंग’पाठकों और समीक्षकों द्वारा समय-
समय पर सराही गयी हैं।’सौंकलें टूटी पड़ी हैं’ के अनेक गीत हिन्दी
नवगीत की चरोहर हैं|’मन के भीतर मन”एक मनढूटा हुआ,’आए हैं
फिर वही शरद के दिनरात’, ‘शाम कनेरी साड़ी पहने’, ‘सावनी
हवाओं से आँख हुई नम’ आदि गीतों में जहाँ अनुभूति का टटकापन है,
वहीं आकर्षक कहन भी है।
स्व0 रवीन्द्र श्रमर ने सत्य लिखा था,“सांकलें टूटी पड़ी हैं’अपनी गीता-
त्म-कता में पूरी तरह मनभावन है।”उनका गीतकार मोलानाथ गहमरी,
उमाकांत मालवीय, कैलाश गौतम, शंकर द्विवेदी सदृश गीतकारों के
सम्पर्क और सान्निध्य में पल्‍लवित्त-पुष्पित हुआ था। वे अपना एक नया
मुहावरा बना चुके थे लेकिन पत्र-पत्रिकाओं में छपने के प्रति उनकी उदा-
स्तीनता ने इन गीतों को अनेक पाठकों से वंचित कर दिया था।थर्मसमाज
कालेज के हिन्दी विभाग में जब रामंदरश जी मिश्र की उपस्थितिं मेंउन्होंने
अपने गीत पढ़े थे तो उन्होंने कहा था कि इतने अच्छे गीत कहीं पढ़ने को
क्‍यों नहीं मिले? मेघमन्द स्वर में उनका काव्यपाठ उनकी रचनाओं में
अतिरिक्त सौन्दर्य भर देता था। कविता मे नए प्रतीकों, नऐ अर्थों को
समाहित करने की ललक उनमें थी | यहाँ भी कुछ नया रचने या नया
करने का उनका स्वभाव सक्रिय था। हिन्दी कविता में ‘जटायु’ तो बहु-
प्रयुक्त मिथक था, लेकिन ‘सम्पाति’ का उप्रयोग संभवतः उन्होंने ही
किया था | बहुत बाद में ‘सम्पाति-चिन्ता’मलखान प्िंह सिसौदिया)
में इस मिथकीय प्रत्तीक का सर्जनात्मक उपयोग देखने को मिला था|
जवाहर ज्योतति’ की रचना उन्होंने एक सप्ताह में कर दी थी, क्योंकि
प्रकाशक को उसे कहीं पाठ्यक्रम हेतु प्रस्तुत करना था। ‘अनंग’ अभी
तक अप्रकाशित है | इसे प्राच्य मंजूषा’में छप जाना चाहिए |इसी तरह
उनका शौघप्रवन्ध (जो नई कविता पर कंन्द्रित है)भी अप्रकाशित है। पं)
बैजनाथ शर्मा शोध संस्थान इसके प्रकाशन की व्यवस्था करेगा, ऐसा
मेरा विश्वास है।अब स्मृतियाँ ही स्मृतियाँ हैं हमारे पास उस बीते कल की,
उनके साइचर्य में बीते क्षणों की,बतरस की, उनके वैदुष्य-वार्मिता की,
अध्यापन-कौशल की। आज वे नहीं हैं,लेकिन लगता है किजहाँ भी होंगे,
वहीं अपने मस्त, मनमौजी स्वभाव से जीवन्तता की सृष्टि कर रहे होंगे।
समझौता वहाँ भी नहीं किया होगा। वहाँ के मठाधघीशों और अधीश्वरों
से साफ-साफ कह दिया होगा – जीवन के इस संधिपन्र पर गूँगे संकेतों
की भाषा, जब तक लिखी रहेगी तब तक मैं हस्ताक्षर नहीं करूँगा |

डी-+9, रमेश विहार, अलीगढ़ (जशप्र0)
मोए0 09837004443

June 24, 2022

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