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एक शब्द भर हुआ

एक शब्द भर हुआ कि लहरें दौड़ गईंतट की काई तक |
लेकिन मैं बेखबर दूबता गया सिरधुं कींगहराई तक ॥
तर गये जलयान बहुत से पर में तो पाहुत हूं ऐेसा
जिसकी मति में बदा डुवना संध्या के सूरज के जैसा ,
नल और नील अगर छ देते तो शायद में भी तर जाता ,
मगर डुबना लिख बंठा था किस्मत में ही भाग्य विधाता ,
दोलो फ़िर कंसे मैं उठता थल से ऊपर अमराई तक ।
जबकि गुरुत्व बहुत था मेरा और घिसटना था खाई तक |
एक शब्द भर हुआ कि लहरें दौड़ गईं तट की काई तक ।
लेकिन में बेखबर डूबता गया सिन्धु की गहराई तक ॥
मैं भी रामेश्वर-सा पुजता अगर बानरों से उठ पाता ,
लाकन मे बतबर डूबता गया सब्धु का भहुरा३ तक ॥
मैं श्री राम्रेश्वर-्सा पुजता अगर बानरों से उठ पाता ,
सगर हिमालय का बेटा हूं, ट्स-से-मस कंसे हो जाता ,
कहते हो यह अहंकार है जो तुमको लेकर डूबा है ,
हमें दोष व्यर्थ देते हो खुद ही का तो मत्त ऊबा है,
गुणा-भाग क्या सीख ्ज्ख्् एक इक!
अंकसणणित के प्रक्त सरीखा सुल् बनकर ही निकलूगा ,
लेकर हीं उबरूगा , । गया हैं इसका मतलब हीरा
गहरे पानी पैठ च॒क़ा हूँ मोती सागर की ज्वाला पीकर
मैं अन्तर को आलोकित करके वे पन: उगगा क्रान्ति
दृत-सा, रक्त तप्त सूरज ब के
रजितना गहरा सिन्ध॒, चढँगा नभ में उतनी ऊचाई तक ।
पर्वत की क्‍या बात ? करूगा, आलोकित रत्तो राई तक॥
एक शब्द भर हआ कि लहरें दौड गईं तट की काई तक |

क्रिन मैं बेखबर ड्बता गया सिन्धु की गहराई तक।।

June 25, 2022

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